430 साल बाद भी तुलसीदास की पांडुलिपि सुरक्षित
बरेली में 430 वर्षों पुरानी तुलसीदास की हस्तलिखित श्रीरामचरितमानस पांडुलिपि सुरक्षित रखी गई है। पुरातत्व विभाग की तकनीकी और सुरक्षा उपायों ने इसे समय के प्रभाव से बचाया है।
➡️ 430 साल पुरानी तुलसीदास की पांडुलिपि सुरक्षित
➡️ 150 पृष्ठों वाली हस्तलिखित अवधी भाषा में रचना
➡️ पुरातत्व विभाग द्वारा विशेष कैमिकल और टिशू पेपर से संरक्षण
➡️ सुरक्षा हेतु रात में पुलिस तैनात
➡️ साहित्यिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बरेली की अनमोल धरोहर
पुरातत्व विभाग की सुरक्षा और कैमिकल तकनीक से संरक्षित तुलसीदास की अमूल्य धरोहर
सरफराज़ खान/ जन माध्यम
सेंथल,बरेली। हिंदी साहित्य और सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर, श्रीरामचरितमानस की गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई हस्तलिखित पांडुलिपि 430 वर्षों बाद भी बरेली में सुरक्षित रखी गई है। तुलसी मठ के पुजारियों के अनुसार, इतने सालों के बाद भी इस पांडुलिपि के पन्ने न तो सड़े हैं और न ही कोई नुकसान हुआ है।
तुलसीदास का जन्म 1511 में चित्रकूट के राजापुर ग्राम में हुआ था। बचपन में ही वे विद्वानों के संरक्षण में आ गए और उन्हें “राम बोला” नाम दिया गया। बाद में उन्हें तुलसीदास कहा जाने लगा। उन्होंने देश-विदेश में रामकथा सुनाई और 1587 में भगवान के आदेश से रामचरितमानस की रचना शुरू की। इसे पूरा होने में 2 साल, 7 महीने और 26 दिन लगे। इस पांडुलिपि में 150 पृष्ठ हैं, जिनमें हर पृष्ठ पर 7 पंक्तियाँ लिखी गई हैं और यह अवधी भाषा में है। तुलसी मठ के पुजारी रामाश्रय त्रिपाठी के अनुसार, 2004 में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने पांडुलिपि को सुरक्षित करने के लिए विशेष पारदर्शी टिशू पेपर और लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाले कैमिकल्स का प्रयोग किया। सुरक्षा कारणों से पांडुलिपि को कभी भी एक साथ नहीं भेजा जाता था, बल्कि 4-4 पन्नों को अलग-अलग भेजा जाता था।
विद्वानों ने इस पांडुलिपि को तुलसी कालीन और हस्तलिखित माना है। तुलसीदास के पहले शिष्य गणपतराम के वंशज आज भी इस मठ में पुजारी हैं। अयोध्या काण्ड की पांडुलिपि में ‘श्री गणेशाय नमः और श्री जानकी वल्लभो विजयते’ लिखा हुआ है। सुरक्षा हेतु रात में पुलिस भी तैनात रहती है ताकि इस अनमोल धरोहर को कोई क्षति न पहुँचा सके। यह पांडुलिपि न केवल साहित्यिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी बरेली की एक अनमोल धरोहर है।