खबर छपते ही बौखलाया प्राइवेट संस्था का सचिव, संपादक को सार्वजनिक स्थान पर घेरकर गाली-गलौज व धमकी का आरोप
बरेली में एक खबर प्रकाशित होने के बाद प्राइवेट संस्था के सचिव पर संपादक को सार्वजनिक स्थान पर घेरकर गाली-गलौज और धमकी देने का आरोप लगा है। मामला प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखा जा रहा है।
➡️ खबर प्रकाशित होते ही संस्था सचिव पर बौखलाने का आरोप
➡️ सार्वजनिक स्थान पर संपादक को घेरने और गाली-गलौज का दावा
➡️ धमकी देकर खबर न छापने का दबाव बनाने की कोशिश
➡️ प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी से मामला और गंभीर
➡️ सरकारी पद और प्राइवेट संस्था के टकराव पर सवाल
➡️ राजनीतिक संरक्षण में दबाव बनाने का आरोप
➡️ पत्रकार संगठनों में आक्रोश, सख्त कार्रवाई की मांग
➡️ प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया जा रहा मामला
जन माध्यम। बरेली।
उत्तर प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्राइवेट संस्था से जुड़े डॉक्टरों और अधिकारियों की कथित भूमिका को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद संस्था के सचिव डॉ. शकील अहमद पर एक समाचार पत्र के संपादक को सार्वजनिक स्थान पर घेरकर गाली-गलौज और धमकियाँ देने का गंभीर आरोप लगा है।
पीड़ित संपादक के अनुसार, यह घटना अचानक उपजे गुस्से का परिणाम नहीं, बल्कि खबर के जरिए सामने आई तथ्यों से असहज होकर दबाव बनाने की कोशिश थी। आरोप है कि जानबूझकर सार्वजनिक स्थान पर उन्हें रोका गया, घेरा गया और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए धमकाया गया, ताकि भविष्य में इस विषय पर कलम न चल सके।
आरोप नहीं, प्रत्यक्षदर्शी और घटनाक्रम मौजूद
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी और मौके पर देखे गए हालात घटना की गंभीरता को दर्शाते हैं। बताया जाता है कि जिस स्थान पर यह सब हुआ, वहां आम लोग भी मौजूद थे। इसे पत्रकार को डराने-धमकाने और सच दबाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सरकारी पद और प्राइवेट संस्था के टकराव पर सवाल
खबर का मूल विषय यह था कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कुछ डॉक्टर और अधिकारी कथित तौर पर एक प्राइवेट संस्था में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो यह सरकारी सेवा नियमों के उल्लंघन का मामला बनता है। इसी मुद्दे को उजागर करने पर कथित तौर पर यह विवाद खड़ा हुआ।
राजनीतिक संरक्षण में दबाव का आरोप
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घटना के दौरान कुछ प्रभावशाली डॉक्टर, जो विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े बताए जा रहे हैं और पूर्व में संस्था में पदों पर रह चुके हैं, मौके पर मौजूद थे। इससे यह आशंका और गहराती है कि पूरा मामला राजनीतिक प्रभाव के साये में दबाव बनाने का प्रयास था।
पत्रकार संगठनों में आक्रोश
घटना के बाद पत्रकार संगठनों और बुद्धिजीवियों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि यदि आज एक संपादक को सार्वजनिक रूप से अपमानित और धमकाया जा सकता है, तो कल कोई भी पत्रकार सुरक्षित नहीं रहेगा। संगठनों ने प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधे हमले के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यही है कि क्या प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप कर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की रक्षा करेगा, या दबाव और डर का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।