कूड़े में दबती किला नदी

बरेली की किला नदी कूड़े, अतिक्रमण और सरकारी अनदेखी से सिमटती जा रही है। डोर टू डोर कर्मियों से सांठगांठ और अवैध कब्जों ने नदी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।

कूड़े में दबती किला नदी
AI द्वारा काल्पनिक फोटो
HIGHLIGHTS:

➡️ कूड़े और अतिक्रमण से दम तोड़ती किला नदी
➡️ डोर टू डोर कर्मियों से सांठगांठ के आरोप
➡️ नदी की जमीन पर अवैध निर्माण और कारोबार

जन माध्यम
बरेली।
किला नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कभी शहर की पहचान रही यह नदी अब गंदगी, अतिक्रमण और सरकारी अनदेखी के बोझ तले दम तोड़ती नजर आ रही है। नदी की स्वाभाविक धार को काटकर माफियाओं ने जिस तरह उसकी जमीन पर कब्जा किया है, उसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि अवैध कब्जेदारों ने नगर निगम के डोर टू डोर कचरा उठाने वाले कर्मियों से साठगांठ कर लोगों के घरों से निकलने वाला कूड़ा नदी किनारे खाली पड़ी जमीन पर डलवाया। वर्षों तक कचरा डालकर जमीन को ऊंचा और समतल किया गया और फिर उसी पर इमारतें खड़ी कर दी गईं। कई प्रॉपर्टी डीलरों ने तो नदी की जमीन को कब्जाकर उसकी खरीद फरोख्त तक कर डाली। नतीजा यह हुआ कि किला नदी दिन ब दिन संकरी होती चली गई और अब नाले जैसी दिखने लगी है। स्वच्छ भारत मिशन की खुलेआम धज्जियां उड़ती दिख रही हैं। केंद्र सरकार जहां सफाई को प्राथमिकता दे रही है, वहीं नगर निगम के कुछ कर्मी कथित रूप से पैसे लेकर नदी क्षेत्र में कचरा डंप करा रहे हैं। किला छावनी क्षेत्र के लोगों ने कई बार इसकी शिकायत की, लेकिन कार्रवाई कागजों से बाहर नहीं निकल सकी। अवैध कब्जे के खेल में सरकारी तंत्र की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। नदी की जमीन पर कहीं मुर्गी फार्म चल रहे हैं तो कहीं पक्के निर्माण खड़े हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि नदी की धार को बांधकर एक मैरिज हॉल तक बना दिया गया। शिकायत पर बीडीए ने नोटिस जरूर जारी किया, लेकिन कथित राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई फाइलों में दबकर रह गई।

हाल ही में डीएम अविनाश सिंह ने नदियों को अतिक्रमण मुक्त कराने और दूषित पानी पर रोक के निर्देश दिए थे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। इस मामले में एक अधिकारी का कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की इजाजत किसी को नहीं है। किला नदी की भूमि पर कब्जे की शिकायत मिलने पर जांच कर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सवाल यही है क्या किला नदी को बचाने की कार्रवाई जमीन पर भी दिखेगी, या यह नदी यूं ही कागजी आदेशों में सिमटकर रह जाएगी?