सेंथल का कोहिनूर: बैंड में लाइट ढोने वाला मजदूरी करने वाला लाल बना देश का बड़ा वैज्ञानिक।

सेंथल के डॉ. आर.बी. लाल मौर्य की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने गरीबी और मजदूरी के बीच पढ़ाई कर वैज्ञानिक बनने का सपना पूरा किया और आज केंद्र सरकार में बड़े पदों पर आसीन हैं।

सेंथल का कोहिनूर: बैंड में लाइट ढोने वाला मजदूरी करने वाला लाल बना देश का बड़ा वैज्ञानिक।
सेंथल के डॉ. आर.बी. लाल मौर्य
HIGHLIGHTS:

पढ़ाई के खर्च के लिए शादियों में बैंड की लाइट ढोने का काम किया।

अत्यधिक गरीबी के बावजूद लक्ष्य से नहीं भटके और वैज्ञानिक बने।

वर्तमान में दिल्ली में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय में प्रमुख पदों पर तैनात।

सरफराज़ खान। जन माध्यम

सेंथल। बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की नगर पंचायत सेंथल के एक साधारण परिवार से निकलकर देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बनने तक का डॉ. आर.बी. लाल मौर्य का सफर किसी फिल्म की कहानी जैसा है। मोहल्ला चौधरी के रहने वाले झम्मन लाल मौर्य (पंडित जी) के घर जन्मे इस बालक के लिए शिक्षा का मार्ग कांटों भरा था। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि पढ़ाई का खर्च उठाना नामुमकिन था, लेकिन 'राम का लाल' कहे जाने वाले इस युवा ने हार नहीं मानी। अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्होंने शादियों और बारातों में बैंड वालों की लाइट ढोने का काम किया। कई बार बारातियों की बदतमीजी सहनी पड़ी और कभी पैसे भी नहीं मिले, लेकिन आगे बढ़ने की जिद ने उन्हें कमजोर नहीं होने दिया। दिन में मजदूरी और रात में नगर पंचायत की लाइटों के नीचे पढ़कर उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल किया।

आज वही बालक डॉ. आर.बी. लाल मौर्य के नाम से जाना जाता है और देश की राजधानी दिल्ली में केंद्र सरकार के अधीन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जब वे पहली बार वैज्ञानिक बनकर अपने गृह नगर सेंथल लौटे, तो पूरा कस्बा उनके स्वागत में उमड़ पड़ा था। उस समय एक छोटे से शिवालय में दिए गए उनके भावनात्मक भाषण ने हर किसी की आंखें नम कर दी थीं। आज वे न केवल मौर्य समाज बल्कि पूरे क्षेत्र के युवाओं के लिए एक बड़े रोल मॉडल बन चुके हैं।