गौस-ए-आज़म की यौमे पैदाइश का जश्न और अकीदत के साथ मनाया

गौस-ए-आज़म की यौमे पैदाइश का जश्न और अकीदत के साथ मनाया

बरेली। रमज़ान का पाक महीना बरकतों और फज़ीलतों से भरा हुआ होता है। इस महीने की रूहानी फिज़ा में एक और रोशन दिन तब जुड़ गया जब मस्जिद नोमहला शरीफ, दरगाह नासिर मियां में सूफी संतों के सरदार, पीरों के पीर हज़रत शेख अब्दुल कादिर जीलानी गौस-ए-आज़म की यौमे पैदाइश का जश्न पूरी अकीदत और एहतराम के साथ मनाया गया।
गौस-ए-आज़म की पैदाइश पर इस खास और पाक रात को यादगार बनाने के लिए तमाम अकीदतमंद दरगाह पर जमा हुए। इस मौके पर बाद नमाज़-ए-असर खास नजराना-ए-अकीदत पेश किया गया। नमाज़-ए-मगरिब से पहले सामूहिक रोज़ा इफ्तार का आयोजन किया गया, जहां सैकड़ों की तादाद में रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला और दुआएं मांगी। इस मुकद्दस महफिल का इन्तेज़ाम दरगाह के सज्जादानशीन हज़रत ख़्वाजा सुल्तान अहमद नासरी साबरी की सरपरस्ती में किया गया था।

इस मौके पर खादिम सूफी वसीम मियां साबरी नासरी ने दस्तरख्वान सजाया, जहां रोज़ेदारों के लिए इफ्तार का खास इंतजाम किया गया था। यहां पर मौजूद तमाम अकीदतमंदों ने मिलकर अल्लाह तआला से अपने लिए, अपने परिवार के लिए और मुल्क की तरक्की के लिए दुआएं मांगी।

गौस-ए-आज़म की यौमे पैदाइश के इस मुबारक मौके पर हज़रत सूफी शाने अली कमाल मियां साबरी नासरी ने मुल्क और अवाम की सलामती, खुशहाली और भाईचारे के लिए खास दुआएं कीं। उन्होंने बीमारों के सेहतयाब होने, बेरोजगारों को रोजगार मिलने और मुल्क में अमन-चैन की दुआ मांगी। उन्होंने कहा कि गौस-ए-आज़म की जिंदगी इंसानियत के लिए एक बेहतरीन मिसाल है और हमें उनके बताए रास्ते पर चलकर समाज में अमन और मोहब्बत फैलाने की कोशिश करनी चाहिए।
इस मौके पर जनसेवा टीम के अध्यक्ष पम्मी खां वारसी ने कहा कि गौस-ए-आज़म का फैज़ हर दौर में कायम है। उनकी रहमत से इंसान की परेशानियां दूर होती हैं और उसे सही राह मिलती है। उन्होंने कहा, "हम यह दुआ मांगते हैं कि अल्लाह रमज़ान की बरकतों से हम सबकी आख़िरत और दुनिया बेहतर बनाए।

गौस-ए-आज़म हज़रत शेख अब्दुल कादिर जीलानी इस्लाम के एक सबसे बड़े पीर है। जिनकी तालीमात ने दुनियाभर में लाखों लोगों की जिंदगी को रोशन किया। उन्होंने हमेशा इन्सानियत, परहेज़गारी और अल्लाह की इबादत पर ज़ोर दिया। उनकी जिंदगी का हर पहलू हमें नेक बनने और भलाई के काम करने की सीख देता है। उनके करामात और इस्लामी खिदमतों के कारण उन्हें गौस-ए-आज़म (यानी महान मददगार) का मुकाम हासिल हुआ।
इस मौके पर मौजूद तमाम अकीदतमंदों ने एक-दूसरे को यौमे पैदाइश की मुबारकबाद पेश की। मौलाना हसन, मुफ्ती अब्दुल बाकी मरकज़ी, सूफी वसीम मियां, पम्मी खां वारसी और अन्य हजरात ने गौस-ए-आज़म की शान में खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए कहा कि उनकी तालीमात आज भी हमें सही राह दिखाती हैं।इस पूरे आयोजन में अमन, भाईचारे और मोहब्बत का पैगाम दिया गया। गौस-ए-आज़म की तालीम का एक अहम हिस्सा इंसानियत से मोहब्बत और हर एक के साथ अच्छा बर्ताव करना रहा है। इस मौके पर मौजूद उलेमाओं ने तालीम दी कि अगर हम अपने दिलों को नफरत से दूर रखें और समाज में अच्छाई फैलाने की कोशिश करें, तो यही गौस-ए-आज़म की तालीम पर चलने का सबसे अच्छा तरीका होगा।रमज़ान का महीना इबादत, रहमत और मग़फिरत का महीना होता है। इस महीने में किए गए अच्छे कामों का कई गुना सवाब मिलता है। गौस-ए-आज़म की यौमे पैदाइश का यह जश्न रमज़ान की फज़ीलतों के साथ और भी खास बन गया। इस दौरान आए हुए उलेमा-ए-किराम ने लोगों को नसीहत की कि वे अपनी जिंदगी में इस्लामी तालीम को अपनाएं और हर वक्त अल्लाह की रहमत के तलबगार बनें।


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