जब इंसानियत ने सफेद कोट पहन लिया
कोरोना काल में खुद संक्रमित होने के बावजूद सेवा नहीं छोड़ी। डिप्टी सीएमओ बरेली डॉ. लईक अहमद अंसारी की इंसानियत और बलिदान की सच्ची कहानी।
➡️ कोरोना संकट में फ्रंटलाइन पर रहकर निभाई ऐतिहासिक भूमिका
➡️ खुद संक्रमित होने के बावजूद मरीजों की सेवा जारी
➡️ पद नहीं, पीड़ा की पहचान बने डिप्टी सीएमओ बरेली
➡️ सैकड़ों परिवारों के लिए बने उम्मीद की आखिरी किरण
➡️ IMA यूपीकॉन-2025 में राष्ट्रीय सम्मान से नवाज़े गए
➡️ सम्मान से ज्यादा दुआओं में बसता नाम
डॉ.लईक अहमद अंसारी,पद नहीं, पीड़ा की पहचान बने डिप्टी सीएमओ बरेली
हसीन दानिश/ जन माध्यम
बरेली। जीवन अगर इबादत है तो सेवा उसकी दुआ, जो खुद को मिटा दे, वही बनता है खुदा की रज़ा।कुछ लोग सांस तो लेते हैं अपने लिए,लेकिन कुछ लोग दूसरों की सांसें बचाने के लिए जीते हैं।
डॉ. लईक अहमद अंसारी ऐसे ही एक इंसान हैं जिनका नाम सुनते ही दिल में भरोसा जगता है, आंखों में उम्मीद चमक उठती है और दर्द से कराहते चेहरे पर सुकून उतर आता है। वे बरेली के डिप्टी सीएमओ भर नहीं हैं, वे उस करुणा का नाम हैं जो आज के कठोर समय में दुर्लभ होती जा रही है। उनके जीवन की नींव सेवा और संस्कारों पर रखी गई। उनके पिता एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ हेडमास्टर ने उन्हें सिखाया कि पद नहीं, कर्तव्य बड़ा होता है। वही संस्कार आज उनके हर फैसले में बोलते हैं। डॉ. लईक के लिए हर मरीज सिर्फ एक फाइल नहीं, बल्कि किसी मां की उम्मीद, किसी बच्चे का सहारा और किसी परिवार की आखिरी आस होता है। वे दर्द को आंकड़ों में नहीं, दिल में महसूस करते हैं। शायद यही वजह है कि उनकी आंखें थकती हैं, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं।
दर्द को सीने में उतार लेना आसान नहीं होता, हर टूटते इंसान को संभाल लेना आसान नहीं होता। फिर आया वह भयावह दौर कोविड-19, जिसने पूरी दुनिया को झुका दिया। सड़कों पर सन्नाटा था, अस्पतालों में चीखें थीं और हर सांस मौत से जूझ रही थी। लोग अपनों से दूर भाग रहे थे, लेकिन डॉ. लईक अहमद अंसारी अपनों के और करीब जा रहे थे। जब डर सबसे बड़ा दुश्मन बन गया था, तब वे ढाल बनकर खड़े थे। संक्रमित इलाकों में दौरे, रात-रात भर काम, सुरक्षा की चिंता छोड़कर मरीजों की फिक्र उन्होंने हर सीमा लांघ दी। और सबसे पीड़ादायक सच वे खुद कोरोना की चपेट में आ गए। शरीर टूट रहा था, सांसें भारी थीं, बिस्तर पर लेटे लेटे भी दिल अस्पतालों में भटक रहा था। परिवार की आंखों में डर था, लेकिन उनकी आंखों में सिर्फ एक सवाल मेरे न रहने से कहीं कोई जिंदगी न हार जाए? बीमारी में भी उन्होंने जिम्मेदारी नहीं छोड़ी। यह केवल साहस नहीं था यह बलिदान था।
खुद जलकर दूसरों को रोशनी दे जाना, यही तो असली इंसानियत कहलाना। कितनी मांओं की गोद उजड़ने से बची,कितने बच्चों के सिर से पिता का साया बचा इन आंकड़ों को कोई गिन नहीं सकता,
क्योंकि यह काम दिल से होता है, हिसाब से नहीं। उनके इस अदम्य साहस और निस्वार्थ सेवा को विधायक वीर विक्रम सिंह ‘प्रिंस’ का प्रशस्ति पत्र सम्मानित करता है, लेकिन सच तो यह है कि सबसे बड़ा सम्मान उन दुआओं में है, जो हर रोज किसी अनजान के होंठों से निकलती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मिले सैकड़ों सम्मान,आईएमए के पुरस्कार, और हाल ही में आईएमए यूपीकॉन-2025 में मिला डॉ. नैम हमीद फॉस्टरिंग फ्रैटरनिटी अवॉर्ड ये सब उनकी मेहनत की चमक हैं। आईएमए बरेली को सर्वश्रेष्ठ शाखा बनाने में उनकी भूमिका इतिहास बन चुकी है। डॉ. लईक अहमद अंसारी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा में कोई शोर नहीं होता, सच्चा त्याग अक्सर खामोश होता है। वे बरेली का गर्व हैं,
उत्तर प्रदेश का सम्मान हैं,
और हर उस इंसान के लिए रोशनी हैं
जो इंसानियत को अभी भी ज़िंदा मानता है।
