किसान की उंगली गई, लेकिन डॉक्टर को क्लीन चिट
रामपुर के किसान नजीब आलम की सर्जरी के बाद उंगली कट गई, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की जांच में डॉक्टर को क्लीन चिट मिल गई। मामला सिस्टम की पारदर्शिता और गरीब मरीजों के न्याय पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
➡️ 13 अक्टूबर 2023 से दर्द झेल रहा किसान नजीब आलम
➡️ ऑपरेशन के बाद काटनी पड़ी दाहिनी हाथ की उंगली
➡️ न्यूरोमा से जूझता मरीज, लगातार दर्द की शिकायत
➡️ स्वास्थ्य विभाग की जांच में डॉक्टर को क्लीन चिट
➡️ सहमति पत्र बनाम मरीज की समझ पर सवाल
➡️ सिस्टम की निष्ठा और गरीब मरीजों के न्याय पर बहस
हसीन दानिश/ जन माध्यम
बरेली। मेहनत और ईमानदारी की मिसाल रामपुर का किसान नजीब आलम आज अपने जीवन की सबसे बड़ी चोट झेल रहा है। खेतों में दिन-रात पसीना बहाकर परिवार पालने वाले नजीब की दाहिनी हाथ की इंडेक्स फिंगर अब उसके लिए सिर्फ याद बनकर रह गई है। 13 अक्टूबर 2023 को क्रश इंजरी के बाद अस्पताल पहुंचे नजीब ने उम्मीद की किरण देखी, लेकिन श्री राममूर्ति स्मारक मेडिकल कॉलेज, भोजीपुरा में सर्जरी के दौरान कथित लापरवाही ने उसकी जिंदगी बदल दी।
नजीब का कहना है, "मैं विकलांग हो गया हूं... खेतों में काम कैसे करूंगा? परिवार का पेट कैसे भरूंगा?" – दर्द की यह चीखें कई कानों तक पहुंची, लेकिन न्याय के दरवाजे तक शायद ही। मुख्य चिकित्सा अधिकारी बरेली ने 29 नवंबर से 5 दिसंबर 2025 तक दो सदस्यीय मेडिकल बोर्ड से जांच करवाई। रिकॉर्ड्स, डॉक्टर के बयान और ऑपरेशन रिपोर्ट की समीक्षा के बाद डॉक्टर एस.के. कौशिक को क्लीन चिट दे दी गई। रिपोर्ट के अनुसार, 23 अक्टूबर 2023 को लिखित सहमति ली गई थी, जिसमें उंगली काटने और संक्रमण के खतरे का जिक्र था। न्यूरोमा को एम्प्यूटेशन का सामान्य जोखिम बताया गया।
लेकिन सवाल यही है – अगर सब कुछ ‘सामान्य’ था, तो नजीब आज भी हर रात जलन और दर्द में क्यों तड़प रहा है? क्या सहमति फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाकर जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित कर दी जाती है? क्या गरीब मरीज को गंभीर साइड इफेक्ट्स की पूरी जानकारी दी गई थी, या सिर्फ लिखित सहमति का खेल खेला गया?
यह केवल नजीब की कहानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है। महीनों से न्याय की तलाश में भटकता एक गरीब किसान, जांच के नाम पर टाला गया, और अंत में रिपोर्ट ने डॉक्टर को बचा लिया। नजीब जैसे हजारों मरीजों का दर्द कागजों में दफन हो जाता है, जबकि बड़े हॉस्पिटल्स में प्रोटोकॉल का ढांचा उनकी आवाज़ को दबा देता है।
रामपुर का नजीब आज भी इंसाफ की गुहार लगा रहा है। उसकी उंगली तो गई, लेकिन भरोसा स्वास्थ्य प्रणाली पर हमेशा के लिए टूट गया। क्या कोई सुन रहा है इस गरीब की पुकार को? या यह भी एक और फाइल बनकर बंद हो जाएगी? नजीब का दर्द सिर्फ शारीरिक नहीं, यह दिल का दर्द है – जो हर पल कह रहा है, “इंसाफ दो... इंसाफ दो!”