हाजी अली अहमद को दी गई खिराज-ए-अकीदत
नवाबगंज के मरहूम हाजी अली अहमद की शोक सभा में फैसल मंसूरी सहित कई गणमान्य लोगों ने पहुंचकर खिराज-ए-अकीदत पेश की।
➡️ हाजी अली अहमद की शोक सभा आयोजित
➡️ फैसल मंसूरी पहुंचे परिजनों से मिलने
➡️ गहरे शोक के साथ व्यक्त की संवेदना
➡️ समाजसेवी सलीम कुरैशी ने पढ़ा शेर
➡️ गरीबों के मसीहा के रूप में याद किए गए
➡️ बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
➡️ आत्मा की शांति के लिए दुआ
जन माध्यम।
सरफराज़ खान। सैंथल (बरेली)।
नवाबगंज की मशहूर शख्सियत मरहूम हाजी अली अहमद की शोक सभा में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रादेशिक महासचिव फैसल मंसूरी अपने साथियों के साथ उनके आवास पर पहुंचे और परिजनों से मुलाकात कर गहरा शोक व्यक्त किया।
शोक सभा के दौरान वरिष्ठ समाजसेवी सलीम कुरैशी ने मरहूम को याद करते हुए यह शेर पढ़ा—
“जो अब शजर पे नहीं है उस एक पत्ते को,
हवाएं ढूंढती फिरती हैं पागलों की तरह।”
फैसल मंसूरी ने कहा कि हाजी अली अहमद गरीबों के मसीहा थे। उन्होंने कहा कि वह लंबे समय तक उनके साथ जुड़े रहे और आज उन्हें खुद को अकेला महसूस हो रहा है। उनका जाना समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।
इस मौके पर रियाज अंसारी, इस्लाम अंसारी, बब्बू सिद्दीकी, जाहिद अंसारी सहित अनेक लोगों ने मरहूम हाजी अली अहमद को खिराज-ए-अकीदत पेश की और उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ की।