भारतीय पशु चिकित्सा दिवस मनाया गया
भारतीय पशु चिकित्सा दिवस पर राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी में वन हेल्थ दृष्टिकोण से पशुजन्य क्षय रोग नियंत्रण पर जोर दिया गया।
➡️ पशु–मानव–पर्यावरण समन्वय से टीबी नियंत्रण की जरूरत
➡️ देशभर के वैज्ञानिकों व छात्रों ने भाग लिया
➡️ डॉ. सी.एम. सिंह के योगदान को याद किया गया
➡️ वन्यजीवों में टीबी के बढ़ते मामलों पर चिंता
➡️ विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित किया गया
वन हेल्थ दृष्टिकोण से पशुजन्य क्षय रोग नियंत्रण पर जोर
जन माध्यम
बरेली।भारतीय पशु चिकित्सा दिवस के अवसर पर एक राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर से वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, पशु चिकित्सकों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह दिवस भारतीय पशु चिकित्सा संस्थान आईवीआरआई के पूर्व निदेशक डॉ. चित्तामणि सिंह की जयंती के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. सी.एम. सिंह एंडोमेंट ट्रस्ट,द्वारा किया गया।
संगोष्ठी में बारहवें डॉ. सी.एम. सिंह स्मृति व्याख्यान के मुख्य वक्ता प्रो. सरमन सिंह, पूर्व निदेशक, एम्स भोपाल रहे। उन्होंने क्षय रोग विशेषकर पशुजन्य क्षय रोग टीबी की बढ़ती चुनौती पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि टीबी का पूर्ण नियंत्रण तभी संभव है, जब वन हेल्थ पद्धति को अपनाकर मनुष्य, पशु और पर्यावरण इन तीनों के सामूहिक दृष्टिकोण से प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि पालतू एवं वन्यजीव दोनों ही रोग के प्रमुख वाहक हैं, इसलिए नियंत्रण की रणनीति व्यापक होनी चाहिए।
आईवीआरआई वन्यजीव केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एम. करिकलन ने भी वन्यजीवों में क्षय रोग की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बंदरों, हाथियों, हिरणों सहित अनेक प्रजातियों में टीबी के मामले लगातार सामने आना अत्यंत चिंताजनक है। माइकोबैक्टीरियम की नई प्रजातियों का मिलना इस रोग के व्यापक फैलाव की पुष्टि करता है।
कार्यक्रम की शुरुआत ट्रस्ट के उपाध्यक्ष डॉ. एस.के. अग्रवाल के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने पशु स्वास्थ्य को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक और स्वस्थ पशु ही उच्च उत्पादन का आधार हैं। ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. एम.एल. मेहरोत्रा ने डॉ. सी.एम. सिंह के प्रेरक व्यक्तित्व, समर्पण और योगदान पर प्रकाश डाला और उन्हें पशु चिकित्सा जगत का पथप्रदर्शक बताया।इस अवसर पर कई विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित किया गया, जिनमें मुख्य वक्ता प्रो. सरमन सिंह को स्मृति व्याख्यान पुरस्कार, डॉ. अभिजीत पावड़े को शालिहोत्र सम्मान तथा डॉ. के.एन. कांडपाल को आर.डी. शर्मा पुरस्कार प्रदान किया गया। विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें टीबी और अन्य पशुजन्य रोगों से लड़ने के लिए शोध, जागरूकता और सामूहिक प्रयास को समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया गया।