उपभोक्ता लुटते रहे, अधिकारी आंखें मूंदे रहे: बिजली विभाग का बड़ा घोटाला, मीटर घरों तक नहीं, दलालों की जेब तक पहुंचे!
1. बड़े अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में
2. मीटर घोटाले की पोल खुली, पर कार्रवाई तय नहीं
बरेली। बिजली विभाग की कार्यशैली पर एक बार फिर से गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। ताजा खुलासे में सामने आया है कि उपभोक्ताओं को बिना मीटर के ही बिजली कनेक्शन जारी किए गए और बिल धड़ल्ले से भेजे गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो मीटर उपभोक्ताओं के घरों में लगने चाहिए थे, वे बिजली विभाग के संविदा कर्मचारी रोहताश शर्मा उर्फ लालकरन के घर में गोदाम की तरह जमा पाए गए। इस घोटाले ने बिजली विभाग की पारदर्शिता और ईमानदारी की धज्जियां उड़ा दी हैं। फरीदपुर के मोहल्ला कानूनगोयन में विजिलेंस टीम ने जब छापा मारा, तो अधिकारी हैरान रह गए।
संविदा कर्मचारी के घर से 74 से अधिक बिजली मीटर बरामद हुए, जिनमें ज्यादातर नए थे और विभागीय सीलिंग के साथ सुरक्षित थे। विजिलेंस की प्रारंभिक जांच में पता चला है कि 50 मीटरों के सीरियल नंबरों की जांच की जा चुकी है, लेकिन 20 से अधिक मीटर ऐसे हैं, जिनका विभागीय रिकॉर्ड में कोई अता-पता नहीं है। यानी या तो ये मीटर चोरी हुए थे या फिर विभागीय मिलीभगत से इनकी कालाबाजारी की जा रही थी। बिजली विभाग में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह मामला आम जनता की जेब पर सीधा डाका डालने जैसा है। उपभोक्ताओं को बिना मीटर के ही बिजली बिल भेजे जा रहे थे, तो फिर उनकी खपत का आकलन कैसे किया गया?
क्या यह डेटा मनगढ़ंत था? या फिर विभाग के अधिकारियों ने अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए उपभोक्ताओं को अंधेरे में रखा? जो उपभोक्ता सोच रहे थे कि उनका मीटर जल्द ही लग जाएगा, वे यह नहीं जानते थे कि उनका मीटर कहीं और पहुंच चुका है। बिजली विभाग की इस लापरवाही का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा था, जबकि अधिकारी मोटी कमाई में व्यस्त थे।
इस पूरे घोटाले में बिजली विभाग के छोटे कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि बड़े अधिकारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब विजिलेंस टीम की छापेमारी हुई, तो अधीक्षण अभियंता ज्ञानेंद्र सिंह ने बस इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वे विजिलेंस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन यह बयान सवालों को दबाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
क्या अधिशासी अभियंता को इस घोटाले की कोई भनक नहीं थी? क्या जूनियर इंजीनियर (जेई) भी इस खेल में शामिल थे? क्या विभाग के अंदरूनी लोग मीटरों की हेराफेरी कर रहे थे?
ये सभी सवाल बिजली विभाग की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाते हैं और अगर सही तरीके से जांच हुई, तो कई बड़े नाम बेनकाब हो सकते हैं।
यह पूरा मामला इस ओर इशारा करता है कि बिजली मीटरों की कालाबाजारी बड़े पैमाने पर हो रही थी। हो सकता है कि इन मीटरों को बाद में ऊंचे दामों पर बेचा जाता हो या फिर रिश्वत देकर पसंदीदा उपभोक्ताओं को बिना किसी देरी के दिए जाते हों। कई मामलों में यह भी देखने को मिला है कि मीटर लगाने में देरी का बहाना बनाकर बिजली विभाग के कर्मचारी उपभोक्ताओं से अतिरिक्त पैसे मांगते हैं। यानी अगर आप चाहते हैं कि आपका मीटर जल्दी लगे, तो जेब ढीली करनी पड़ेगी। यह रॉकेट साइंस नहीं बल्कि बिजली साइंस है, जो पूरी तरह से भ्रष्टाचार पर टिकी हुई है।
बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं, लेकिन दोषियों के खिलाफ शायद ही कभी सख्त कार्रवाई हुई हो। विजिलेंस जांच के नाम पर कुछ दिनों तक सुर्खियां बनती हैं, फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।