11 करोड़ हवा में, जनता पैदल ज़मीन पर
पटेल चौक स्काईवॉक में वर्षों की देरी और लापरवाही पर स्मार्ट सिटी ने कड़ा कदम उठाते हुए 15 वर्षों का संचालन ठेका रद्द किया।
➡️ 11.18 करोड़ की लागत से बना स्काईवॉक दो साल तक रहा बंद
➡️ 15 वर्षों का संचालन एवं रखरखाव अनुबंध तत्काल प्रभाव से रद्द
➡️ एजेंसी पर लेटलतीफी और गैरजिम्मेदारी के गंभीर आरोप
➡️ तीन दिन में सभी उपकरण यथास्थिति में सौंपने के निर्देश
➡️ वैकल्पिक व्यवस्था पर स्मार्ट सिटी ने तेज़ किया काम
डेस्क/ जन माध्यम
बरेली। शहर जब विकास के सपने देखता है, तो उम्मीद करता है कि योजनाएं ज़मीन पर उतरेंगी, सिर्फ फाइलों में नहीं। लेकिन पटेल चौक का स्काईवॉक इन सपनों का ऐसा ढांचा बन गया, जो बना तो सही, पर जनता तक पहुंच ही नहीं पाया। करीब 11.18 करोड़ रुपये की लागत, डेढ़ साल का निर्माण, और उसके बाद दो साल का सन्नाटा ना उद्घाटन ना उपयोग, सिर्फ सवाल।
स्मार्ट सिटी योजना के तहत 15 अप्रैल 2022 को शुरू हुआ स्काईवॉक 30 दिसंबर 2023 को बनकर तैयार हो गया था। इसके बाद 20 जून 2025 को आनंदी इंटरप्राइजेज को 15 वर्षों का संचालन एवं रखरखाव अनुबंध दिया गया। लेकिन यहीं से शुरू हुई वह कहानी, जिसमें लेटलतीफी, बहाने और गैरजिम्मेदाराना रवैये ने जनता को पैदल ज़मीन पर ही छोड़ दिया।
बरेली स्मार्ट सिटी लिमिटेड (बीएसएसएल) ने आखिरकार सब्र का बांध तोड़ दिया। लगातार चेतावनियों, नोटिसों और समयसीमाओं की अनदेखी को देखते हुए अनुबंध को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया। बीएसएसएल अध्यक्ष के अनुमोदन के बाद एजेंसी को तीन दिन के भीतर स्काईवॉक से जुड़े सभी उपकरण यथास्थिति में सौंपने के निर्देश जारी किए गए। इस फैसले से एजेंसी में हड़कंप मच गया, लेकिन शहर ने इसे देर से आया सही, पर जरूरी कदम माना।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सितंबर में हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद स्काईवॉक जनता को नहीं सौंपा गया। दो साल तक करोड़ों की परियोजना यूं ही खड़ी रही, मानो विकास खुद शर्मिंदा हो।
अब मामले में अंदरूनी खेल की बू भी तेज़ हो चली है। जानकारों का दावा है कि जानबूझकर देरी कराई गई, ताकि अनुबंध निरस्त हो और भविष्य में किसी “करीबी” फर्म को ठेका मिल सके। नोटिसों का जवाब न देना, जिम्मेदारी से भागना—इन सबने इस साजिश को और गहरा किया।
बीएसएसएल अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि स्काईवॉक जनता की सुविधा के लिए है, किसी एजेंसी की मनमानी के लिए नहीं। सीईओ संजीव कुमार मौर्य ने दो टूक कहा कि बार-बार चेतावनी के बावजूद सुधार नहीं हुआ, इसलिए कड़ा फैसला लेना पड़ा। अब वैकल्पिक व्यवस्था पर काम तेज़ी से किया जा रहा है।
पटेल चौक का स्काईवॉक आज सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि एक सवाल है—
क्या विकास की कीमत सिर्फ पैसे से चुकाई जाती है, या जवाबदेही से भी?
अब देखना यह है कि यह पुल कब सच में जनता के कदमों के नीचे आएगा,
या फिर कागज़ों में ही चलता रहेगा।