बिलों में इंसाफ या सौदेबाज़ी?
बरेली बिजली विभाग में करोड़ों की बिजली बिल माफी का खेल उजागर हुआ है। ‘बड़े साहब’ की आईडी से लाखों के बिल माफ किए गए और अब उसी घाटे की भरपाई आम उपभोक्ताओं से एरियर के रूप में की जा रही है।
➡️ बिजली विभाग में करोड़ों की बिल माफी का खुलासा
➡️ ‘बड़े साहब’ की आईडी से 10 लाख तक के बिल माफ
➡️ कोल्ड स्टोरेज व बड़े उपभोक्ताओं को मिला फायदा
➡️ 144 बिलों में एक करोड़ से अधिक की कटौती
➡️ जांच समिति ने पकड़ी हेराफेरी, FIR अब तक नहीं
➡️ घाटे की भरपाई आम उपभोक्ताओं से एरियर लगाकर
➡️ वर्टिकल योजना से पहले तेज़ी से खेला गया खेल
➡️ मामला मुख्यालय तक पहुंचा, अफसरों में बेचैनी
जन माध्यम। बरेली।
बिजली विभाग में एक पद होता है,बड़ा साहब। नाम बड़ा है, कुर्सी भारी है और जिम्मेदारी उससे भी कहीं ज़्यादा। लेकिन बरेली में यही बड़ा साहब जनता के लिए उम्मीद नहीं, बल्कि सवाल बन गया। सवाल यह कि क्या बिजली विभाग गरीबों के लिए है या चंद अफसरों और दलालों की तिजोरी भरने का ज़रिया?बिजली बिलों में 10 लाख रुपये तक की माफी कोई जनकल्याणकारी योजना नहीं थी, न ही यह राहत किसी मजबूर उपभोक्ता के लिए थी। यह एक सुनियोजित खेल था, जिसमें अफसर, कर्मचारी और कुछ बड़े उपभोक्ता शामिल थे। खेल ऐसा कि करोड़ों रुपये विभाग के खाते से गायब कर दिए गए, और जब मामला खुला तो सारा बोझ फिर उसी आम उपभोक्ता पर डाल दिया गया, जो पहले ही महंगाई, बेरोज़गारी और गलत बिलों से परेशान है। जिनके लिए माफी थी, वे गरीब नहीं थे काग़ज़ों में भले ही बिजली बिल सुधार या समायोजन के नाम पर घटाए गए हों, लेकिन हकीकत यह है कि इसका लाभ किसी गरीब, किसी विधवा, किसी किसान या किसी छोटे दुकानदार तक नहीं पहुंचा। बल्कि फायदा उठाया बड़े कारोबारी फर्मों ने
कोल्ड स्टोरेज संचालकों ने
बड़े उपभोक्ताओं ने और बीच में दलाली करने वाले विभागीय कर्मचारियों ने बताया जाता है कि सौदा तय होने पर 10 लाख रुपये से ज्यादा तक की रकम बिलों से उड़ा दी गई। यानी जिसने जितनी मोटी रकम नीचे दी, उसका उतना ही भारी बिल ऊपर से गायब कर दिया गया। करोड़ों का नुकसान, मगर रिपोर्ट शून्य हैरानी की बात यह नहीं कि करोड़ों का खेल हुआ, हैरानी यह है कि खुलासा होने के बाद भी संबंधित बड़े साहब ने न कोई एफआईआर न कोई ठोस रिपोर्ट दर्ज कराई। क्यों? क्योंकि कहा जाता है कि फाइनल बिल बनाने की ताकत उन्हीं की आईडी में थी। यानी जांच अगर गहराई तक जाती, तो उंगलियां सीधे कुर्सी तक पहुंच जातीं। वर्टिकल योजना से पहले सफाई अभियान? सूत्र बताते हैं कि वर्टिकल योजना लागू होने से पहले ही यह खेल तेज़ी से खेला गया।
कुछ अधिकारी तो इतने निडर थे कि अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर भी बिलों में भारी भरकम कटौती कर आए। मतलब साफ है, जब तक सिस्टम बदले, पुराने सिस्टम से जितना लूट सको, लूट लो।
144 बिल, जिनमें एक एक करोड़ से ज़्यादा की कटौती जांच में अब तक 144 ऐसे बिजली बिल सामने आए हैं, जिनमें एक करोड़ रुपये से अधिक की रकम कम की गई।
यह आंकड़ा डराता है, क्योंकि यह केवल पकड़े गए मामलों का है।
सवाल यह है कि कितने मामले दबा दिए गए? कितनी फाइलें आज भी अलमारी में बंद हैं? कितने बड़े साहब अब भी सुरक्षित हैं?
जांच तो हुई, मगर भरोसा नहीं
एक गोपनीय शिकायत के बाद जांच समिति बनी।एक्सीईएन रामलाल की अध्यक्षता में गठित समिति में आईटी, कमर्शियल और लेखा से जुड़े अधिकारियों को शामिल किया गया। समिति ने मेहनत की, और करोड़ों रुपये की हेराफेरी के प्रमाण भी पकड़े। क्या सिर्फ जांच काफी है? या फिर इस जांच का अंजाम भी बाकी जांचों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा? अब एरियर लगाकर जनता से वसूली
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि
जिस उपभोक्ता का बिल ठीक कर दिया गया था, अब उसी पर एरियर डालकर वसूली की जा रही है।
उपभोक्ता बिजली दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, हाथ जोड़ रहा है, कह रहा है,साहब, हमने तो पूरा पैसा जमा किया था, फिर अब ये बकाया क्यों? लेकिन सिस्टम के पास कोई जवाब नहीं, सिवाय एक पर्ची और एक तारीख के। घाटे में विभाग, विरोध में कर्मचारी, लूट में सिस्टम
एक तरफ बिजली विभाग घाटे का रोना रो रहा है। पूर्वांचल और दक्षिणांचल में निजीकरण की तैयारी है। कर्मचारी सड़क पर उतरकर विरोध कर रहे हैं।और दूसरी तरफ?
यही विभाग भीतर से दोनों हाथों से लूटा जा रहा है।यह विरोध किस बात का है? निजीकरण का? या फिर उस सिस्टम के खत्म होने का, जिसमें बिना डर के करोड़ों का खेल हो जाता था? मामला मुख्यालय तक, मगर बेचैनी नीचे कहा जा रहा है कि पूरा प्रकरण अब मुख्यालय तक पहुंच चुका है। इससे संबंधित अफसर बेचैन हैं, फोन व्यस्त हैं, फाइलें इधर उधर हो रही हैं।
लेकिन नीचे आम उपभोक्ता आज भी बिजली दफ्तर की सीढ़ियों पर खड़ा है। सवाल जो अभी बाकी हैं
क्या बड़े साहब पर कार्रवाई होगी या सिर्फ मोहरे बलि चढ़ेंगे? क्या जिन अफसरों की आईडी से बिल कम हुए, उनकी जवाबदेही तय होगी?
क्या उपभोक्ताओं से वसूला जा रहा एरियर वापस होगा?और सबसे बड़ा सवाल क्या बिजली विभाग कभी जनता का विभाग बनेगा, या हमेशा अफसरों की जागीर रहेगा?