मौत के बाद भी नहीं छोड़ा लुटेरो ने?
कैंसर मरीजों के नाम पर फर्जी खपत दिखाकर करोड़ों की बंदरबांट, जांच में खुली परतें
मर चुके मरीजों के नाम पर भी चलता रहा दवाओं का हिसाब किताब
कैंसर की दवाओं में करोड़ों की गड़बड़ी, जांच में खुली फर्जीवाड़े की परतें
इलाज के नाम पर खेला गया बड़ा खेल, प्रशासन ने शुरू की सख्त कार्रवाई
मनीष सिंह/जन माध्यम
लखनऊ। चिकित्सा जगत को शर्मसार कर देने वाले एक सनसनीखेज़ मामले में इलाज और इंसानियत का मरकज़ माने जाने वाले अस्पतालों से जब ऐसी खबरें निकलती हैं तो सिर्फ भरोसा नहीं टूटता, बल्कि समाज की रूह तक कांप उठती है। राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी केजीएमयू से सामने आया कथित दवा घोटाला महज़ वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि संवेदनाओं के जनाज़े पर खड़ा किया गया ऐसा कारोबार है, जिसने चिकित्सा जगत की पेशानी पर शर्म का गहरा दाग लगा दिया है। जिन मरीजों की सांसें थम चुकी थीं, जिनके घरों में मातम की चादर बिछ चुकी थी, जिनके अपनों की आंखों के आंसू अभी सूखे भी नहीं थे, उन्हीं दिवंगत मरीजों के नाम पर कैंसर की महंगी दवाओं के बिल तैयार किए जाते रहे। सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें जिंदा दिखाया जाता रहा और करोड़ों रुपये के खेल को अंजाम दिया जाता रहा। यह खुलासा किसी फिल्मी कहानी जैसा जरूर लगता है, लेकिन जांच में सामने आए तथ्यों ने प्रशासनिक गलियारों में भूचाल ला दिया है।
प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, यूरोलॉजी विभाग में असाध्य योजना के तहत खरीदी और वितरित की जाने वाली कैंसर रोधी दवाओं के रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ियां पाई गई हैं। आरोप है कि कई ऐसे मरीजों के नाम पर दवाओं की खपत दिखाई गई, जिनका इंतकाल महीनों पहले हो चुका था। इतना ही नहीं, किडनी रोगियों को कैंसर मरीज दर्शाकर भी दवाओं के बिल तैयार किए गए। यानी बीमारी बदली गई, पहचान बदली गई और सरकारी धन की कथित बंदरबांट का रास्ता तैयार किया गया। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, दिसंबर में जिन मरीजों की मौत हो गई थी, उनके नाम पर जनवरी, फरवरी, मार्च और अप्रैल तक दवाओं की एंट्री दर्ज होती रही। अब तक करीब 40 मामलों में ऐसे संकेत मिले हैं। सवाल यह है कि जब मरीज इस दुनिया में ही नहीं थे, तो उनके नाम पर दवाएं किसे दी गईं? दवाएं कहां गईं? और उन दवाओं के नाम पर निकला पैसा किसकी जेब में पहुंचा? यह वही सवाल हैं जो अब जनता पूछ रही है और जिनका जवाब जांच एजेंसियों को देना होगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए केजीएमयू प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तीन संविदाकर्मियों को बर्खास्त कर दिया है। वहीं चीफ फार्मासिस्ट के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और निलंबन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रशासन की अंतरिम जांच रिपोर्ट के आधार पर विभागाध्यक्ष को भी पद से हटा दिया गया है। लेकिन यह कार्रवाई उस बड़े सवाल का जवाब नहीं है कि आखिर करोड़ों रुपये का यह खेल इतने लंबे समय तक चलता कैसे रहा? दरअसल, यह मामला सिर्फ कुछ कर्मचारियों की कथित करतूत का नहीं लगता। इतनी बड़ी हेराफेरी बिना निगरानी तंत्र की नाकामी या लापरवाही के संभव नहीं मानी जा सकती। जिस अस्पताल में हर दवा का रिकॉर्ड, हर मरीज का विवरण और हर भुगतान की प्रक्रिया दर्ज होती है, वहां महीनों तक मृतकों के नाम पर बिल बनते रहें और किसी को भनक तक न लगे, यह बात आम लोगों के गले नहीं उतर रही।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि यह खेल उन मरीजों के नाम पर खेला गया, जो कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे। जिनके परिवार इलाज के लिए जमीन जायदाद तक बेच देते हैं, जिनकी उम्मीदें सरकारी योजनाओं से जुड़ी होती हैं, उन्हीं योजनाओं को कथित तौर पर लूट का जरिया बना दिया गया। यह केवल सरकारी धन की चोरी नहीं, बल्कि गरीब और बेबस मरीजों के हक पर डाका है।
अब पुलिस और प्रशासनिक जांच की सुई आगे बढ़ चुकी है। केजीएमयू प्रशासन ने विस्तृत जांच और मुकदमा दर्ज कराने के लिए पुलिस को पत्र भेज दिया है। माना जा रहा है कि जांच जैसे जैसे आगे बढ़ेगी, कई और चेहरे बेनकाब हो सकते हैं और घोटाले की वास्तविक रकम भी बढ़ सकती है।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब लालच अपनी इंतिहा पर पहुंच जाता है, तो इंसानियत, नैतिकता और जिम्मेदारी जैसे शब्द फाइलों के किसी कोने में दम तोड़ देते हैं। अस्पताल, जहां जिंदगी बचाने की कसमें खाई जाती हैं, अगर वहीं मौत के बाद भी किसी का नाम कमाई का जरिया बन जाए, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि ज़मीर की मौत है।
जनता अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे सच का इंतजार कर रही है। क्योंकि यह मामला करोड़ों रुपये से कहीं बड़ा है, यह उस भरोसे का मामला है, जिसे बचाए रखना किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। जब भरोसा टूटता है, तो सिर्फ एक घोटाला उजागर नहीं होता, बल्कि व्यवस्था का चेहरा भी बेनकाब हो जाता है।