प्रमाण पत्र नहीं,चक्कर ही चक्कर
सदर तहसील बरेली में आय, जाति व निवास प्रमाण पत्रों के 10 हजार से अधिक आवेदन लंबित, बाबू–लेखपाल की सुस्ती से जनहित गारंटी कानून बेअसर।
➡️ सदर तहसील में 10 हजार से ज्यादा आवेदन लंबित
➡️ आय, जाति, निवास, EWS प्रमाण पत्रों में भारी देरी
➡️ ऑनलाइन गारंटी व्यवस्था सिर्फ कागजों में
जन माध्यम
बरेली। जनहित गारंटी कानून का मकसद था आम आदमी को समय पर सेवा, बिना सिफारिश और बिना चक्कर। लेकिन सदर तहसील ने इस कानून को कागज का खिलौना बनाकर रख दिया है। आय, जाति, निवास, मूल, हैसियत और ई-डब्ल्यूएस प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी दस्तावेजों के लिए लोग जिस तरह भटक रहे हैं, वह सीधे सीधे प्रशासनिक नाकामी और कार्यसंस्कृति के पतन की कहानी कहता है। हालत यह है कि सदर तहसील में दस हजार से अधिक आवेदन लंबित पड़े हैं और सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था को डिजिटल सुशासन का प्रतीक बताया गया था, लेकिन सदर तहसील में यह व्यवस्था सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। आवेदन तो मोबाइल से हो जाता है, पर उसके बाद फाइलें महीनों तक लेखपाल की मेज, राजस्व निरीक्षक की अलमारी और बाबुओं की टेबल के बीच घूमती रहती हैं। रिपोर्ट लगी नहीं साइन बाकी हैं और तारीख कल आना यही सदर तहसील का स्थायी जवाब बन चुका है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह देरी किसी तकनीकी खराबी की वजह से नहीं, बल्कि सुस्ती और उदासीनता की देन है। नियम साफ हैं,आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र दस दिन के भीतर जारी होने चाहिए। लेकिन यहां दस दिन नहीं, दस हफ्ते और दस महीने भी कम पड़ जाते हैं। छात्रवृत्ति से वंचित छात्र, नौकरी के फॉर्म भरने से चूके युवा, बैंक ऋण के लिए भटकते गरीब और जमीन की रजिस्ट्री अटकने से परेशान परिवार सब इस सिस्टम की कीमत चुका रहे हैं।
तहसील परिसर की रोज़ की तस्वीर किसी सरकारी दफ्तर से ज्यादा किसी इंतजारगृह जैसी लगती है। माल बाबू, नाजिर और लेखपालों के इर्द गिर्द जमा भीड़ एक ही सवाल पूछती है,कब बनेगा?” जवाब में कभी फाइल ढूंढी जाती है, कभी कंप्यूटर बंद होने का बहाना, तो कभी साहब की गैरमौजूदगी। दिन निकल जाता है, काम नहीं होता। जब हालात हद से ज्यादा बिगड़ते हैं, तब मजबूरी में लोग एसडीएम या तहसीलदार की चौखट पर पहुंचते हैं। शिकायत करने पर फाइल में थोड़ी हलचल जरूर होती है, लेकिन तब भी दो तीन दिन का समय ऐसे लिया जाता है जैसे कोई विशेष कृपा की जा रही हो। सवाल यह है कि अगर शिकायत के बिना काम नहीं होता, तो जनहित गारंटी का मतलब क्या रह जाता है? दस हजार से ज्यादा लंबित आवेदन सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि प्रशासन की विफलता का दस्तावेज हैं। यह स्थिति बताती है कि सदर तहसील में न तो काम का दबाव महसूस किया जा रहा है और न ही जवाबदेही का डर। जब तक इस सुस्त मशीनरी पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक जनहित गारंटी कानून का नाम लेते रहना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही रहेगा। अब सवाल जनता नहीं, सिस्टम से पूछा जाना चाहिए आखिर कब जागेगी सदर तहसील?