सेंथल की मिट्टी में दफ़्न है आज़ादी की अमर दास्तान

1857 की जंग में नवाब सैयद ग़ालिब अली ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बुलंद किया था बगावत का परचम

सेंथल की मिट्टी में दफ़्न है आज़ादी की अमर दास्तान
सेंथल की मिट्टी में दफ़्न है आज़ादी की अमर दास्तान
सेंथल की मिट्टी में दफ़्न है आज़ादी की अमर दास्तान
HIGHLIGHTS:

* खान बहादुर खान के आह्वान पर नवाब सैयद ग़ालिब अली ने खोला था खजाना और तैयार की थी फौज।

जन माध्यम 
सेंथल। बरेली। सेंथल इतिहास के कुछ सफ़हे ऐसे होते हैं, जिन पर वक्त की धूल भले ही जम जाए, मगर उनमें दर्ज कुर्बानियों की खुशबू कभी फीकी नहीं पड़ती। रुहेलखंड की सरज़मीं पर बसा सेंथल भी ऐसी ही एक मुक़द्दस धरती है, जहां आज़ादी की चाहत में न जाने कितने दीवानों ने अपने अरमानों, अपने घरों और अपनी ज़िंदगियों को मुल्क पर निछावर कर दिया। सन् 1857 का वह दौर हिंदुस्तान की रूह में उठे इंक़लाब का दौर था। अंग्रेजी हुकूमत की जंजीरों में जकड़ा मुल्क आज़ादी के लिए तड़प रहा था। मेरठ से उठी बगावत की चिंगारी जब शोला बनकर पूरे हिंदुस्तान में फैली, तब रुहेलखंड की धरती पर खान बहादुर खान ने आज़ादी का अलम बुलंद किया। इसी पुकार पर सेंथल के नवाब सैयद ग़ालिब अली ने भी लब्बैक कहा और अपने वतन की हिफाज़त के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। कहते हैं कि जब मुल्क पुकारता है तो सच्चे सपूत अपने आराम नहीं देखते। नवाब ग़ालिब अली ने भी यही किया। अपनी जागीर का ख़ज़ाना खोला, फौज तैयार की और अपने बहादुर सिपाहियों को अंग्रेजों के खिलाफ जंग में उतार दिया। उनकी गढ़ी केवल एक इमारत नहीं थी, बल्कि आज़ादी के दीवानों का किला बन चुकी थी, जहां हर सांस में वतन की मोहब्बत और हर धड़कन में आज़ादी का सपना बसता था।
जब अंग्रेज अफसर जान बचाकर नैनीताल की तरफ भाग रहे थे, तब सेंथल की धरती ने वह मंज़र देखा जब नवाब ग़ालिब अली अपने साथियों के साथ शेर की तरह दुश्मनों पर टूट पड़े। गोलियों की गूंज, तलवारों की चमक और या अल्लाह व  हर हर महादेव  के नारों के बीच हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब आज़ादी के लिए एक साथ लड़ रही थी। मगर हर जंग में कुछ गद्दार भी पैदा हो जाते हैं। जब मैदान ए जंग में अंग्रेज हार नहीं पाए, तो उन्होंने धोखे का सहारा लिया। एक गद्दार ने रात के अंधेरे में सेंथल की गढ़ी का दरवाज़ा खोल दिया। अंग्रेज फौज अंदर दाखिल हुई और नवाब ग़ालिब अली को उनके रफ़ीकों के साथ गिरफ्तार कर लिया। फिर आया वह दर्दनाक दिन, जिसने सेंथल की मिट्टी को हमेशा के लिए ग़मगीन कर दिया। 10 मई 1858 को सूली वाले बाग़ में मुकदमा चला। नवाब का खिताब छीन लिया गया, जागीर ज़ब्त कर ली गई और उन्हें उम्रभर की नज़रबंदी का फरमान सुना दिया गया। लेकिन इससे भी ज्यादा दर्दनाक वह मंज़र था, जब खेमकरण अहीर, भोले बेलदार और कई मुजाहिदीन ए आज़ादी को एक विशाल बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई। उस रोज़ शायद पेड़ की शाखें भी कांप उठी होंगी, हवाएं भी सिसकी होंगी और सेंथल की मिट्टी भी अपने बेटों के लहू से भीगकर रो पड़ी होगी। उन शहीदों के जिस्म भले ही फंदों पर झूल गए, मगर उनके हौसले आसमान से भी ऊंचे हो गए। आज जब हम आज़ाद फिज़ा में सांस लेते हैं, तब यह याद रखना जरूरी है कि इस आज़ादी की बुनियाद में सेंथल जैसे अनगिनत गांवों और कस्बों के गुमनाम शहीदों का लहू शामिल है। नवाब सैयद ग़ालिब अली की कुर्बानी हमें यह पैगाम देती है कि वतन की मोहब्बत किसी दौलत, किसी ओहदे और किसी ताज से कहीं बड़ी होती है। सेंथल का इतिहास केवल एक कहानी नहीं, बल्कि वह दर्दभरी दास्तान है, जो आज भी हर हिंदुस्तानी से कहती है जो लोग वतन के लिए मिट गए, वही असल मायनों में अमर हो गए।
उनकी कुर्बानियों का कर्ज़ शायद कभी अदा न हो सके, मगर उनकी यादें हमेशा हिंदुस्तान के दिल में ज़िंदा रहेंगी