जुलूस-ए-आलम में उमड़ी अकीदतमंदों की भीड़
सैंथल में मोहर्रम की आठवीं तारीख पर कदीमी जुलूस-ए-आलम अकीदत के साथ निकाला गया। अज़ादारों ने इमाम हुसैन और करबला के शहीदों को याद कर श्रद्धांजलि अर्पित की।
मोहर्रम की आठवीं तारीख पर इमामबाड़ा-ए-कलां से कदीमी जुलूस-ए-आलम निकाला गया।
अज़ादारों ने इमाम हुसैन और करबला के शहीदों की याद में मातम और मर्सिया पढ़ा।
चौधरी चौक पर परंपरागत रस्मों के बाद जुलूस का समापन इमामबाड़ा-ए-कलां में हुआ।
जन माध्यम
सैंथल। मोहर्रम की आठवीं तारीख पर कस्बा सैंथल में करबला के शहीदों की याद में कदीमी जुलूस-ए-आलम अकीदत और एहतराम के साथ निकाला गया। इमामबाड़ा-ए-कलां से बरामद हुए जुलूस में बड़ी संख्या में अज़ादार शामिल हुए और "या हुसैन" की सदाओं के बीच पूरे कस्बे का माहौल गमगीन दिखाई दिया।
जुलूस अपने निर्धारित मार्ग से गुजरते हुए कस्बे के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। काले लिबास में शामिल अज़ादार इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों की शहादत को याद कर मातम करते नजर आए। रास्ते भर जगह-जगह सबीलों का आयोजन किया गया, जहां लोगों को शरबत और अन्य पेय पदार्थ वितरित किए गए। कई स्थानों पर लंगर की व्यवस्था भी की गई।
मोहर्रम की आठवीं तारीख से जुड़े प्रसिद्ध मर्सिये "रन में शब्बीर से रुखसत को जब आए अब्बास" का पाठ किया गया। मर्सिये को सुनकर अनेक अज़ादार भावुक हो उठे और करबला की कुर्बानियों को याद कर अश्कबार नजर आए।
दिनभर विभिन्न मार्गों से गुजरने के बाद देर शाम जुलूस चौधरी चौक पहुंचा, जहां परंपरा के अनुसार धार्मिक रस्मों का आयोजन किया गया। इसके बाद जुलूस पुनः इमामबाड़ा-ए-कलां पहुंचा, जहां मजलिस और दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
पूरे आयोजन के दौरान कस्बे में भाईचारे, अनुशासन और धार्मिक आस्था का माहौल देखने को मिला। स्थानीय लोगों और आयोजकों ने व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग किया, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।