सांसों पर हमला शहर की हवा में ज़हर 

बरेली की हवा घातक: 99 रेड ज़ोन फैक्ट्रियां ज़हर उगल रही, बच्चे-बुज़ुर्ग तड़प रहे, प्रदूषण विभाग खामोश, मौत बनकर छा रहा काला धुआं।

सांसों पर हमला शहर की हवा में ज़हर 
HIGHLIGHTS:

➡️ AQI 200 पार – हवा में ज़हर
➡️ 99 रेड ज़ोन फैक्ट्रियाँ बेरोकटोक धुआँ उगल रही
➡️ शराब और मीट फैक्ट्रियाँ सबसे बड़ा ज़हर
➡️ बच्चे-बुज़ुर्ग साँसों के लिए तड़प रहे
➡️ प्रदूषण विभाग मौन – शाम की महफ़िल में व्यस्त
➡️ डॉक्टरों की चेतावनी: शहर मौत की ओर

प्रदूषण विभाग की चुप्पी ने शहर को मौत की ओर धकेला, बच्चों-बुज़ुर्गों की सांसें डगमगाईं

जन माध्यम
बरेली।
शहर एक ऐसे खतरे के मुहाने पर खड़ा है, जहां हवा में घुला ज़हर हमारे बच्चों की साँसों तक पहुँच चुका है। मगर अफ़सोस, इस शहर की हवा से ज़्यादा जहरीली है प्रदूषण विभाग की खामोशी एक ऐसी खामोशी, जिसने शहर की साँसों को दांव पर लगा दिया है।
जिस विभाग का काम शहर को सांस की राहत देना था, वह आज अपनी ही सुविधाओं की गिरफ्त में कैद होकर बैठा है। 99 रेड ज़ोन वाली फैक्ट्रियां, जो रोजाना आसमान में कालिख और ज़हर उगलती हैं, खुलेआम नियमों को धता बता रही हैं। सुपिरियर इंडस्ट्रियल शराब फैक्ट्री हो या मीट फैक्ट्रियां सब के धुएँ से शहर की हवा घटते हुए जीवन की कहानी कह रही है। लेकिन प्रदूषण विभाग? वह तो मानो अंधा, बहरा और बेहिसाब बेपरवाह हो चुका है।
शहर की हवा में जहर घुल रहा है, मगर विभाग के अधिकारी अपनी लग्ज़री गाड़ियों की चमक में खोए हुए हैं। शाम ढलने के बाद ये अधिकारी किसी फैक्ट्री मालिक के साथ महफ़िल में दिखते हैं, तो कभी किसी मैनेजर के साथ गुफ़्तगू में। उन्हें यदि किसी चीज़ से मतलब है, तो वह है शाम की चाय की चुस्की—न कि बरेली की दम घुटती हुई हवा से। 200  के पार पहुंचता AQI अब भयावह रूप ले चुका है। बच्चे स्कूल जाते समय सांस रोककर चलने को मजबूर हैं। खेल के मैदान सूने हो चुके हैं क्योंकि हवा में इतना ज़हर है कि हर सांस भीतर जाते ही सीने में चुभन सी महसूस होती है।
बुजुर्गों का हाल तो और भी बदतर है। खाँसी, सांस फूलना, सीने का भारीपन ये अब बीमारियां नहीं, शहर की दिनचर्या बन चुकी हैं। डॉक्टर खुलकर कह रहे हैं कि अगर हालात यही रहे, तो शहर जल्द ही कीमत चुका कर रेड ज़ोन में तब्दील हो जाएगा जहाँ जिंदगी कम और मौत का डर ज़्यादा होगा।पर सवाल यह है कि क्या यह चेतावनी उन अधिकारियों के कानों तक पहुंचेगी, जो फाइलों पर दिखावटी नोटिंग करते हुए शहर की सांस बचाने का नाटक कर रहे हैं? क्या उन्हें कभी यह एहसास होगा कि उनका एक निरीक्षण, उनका एक छापा, उनकी एक कार्यवाही सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बचा सकती है? शहर की हवा धीरे धीरे मौत का धोखा देती जा रही है। हर दिन, हर सांस, हर दिल की धड़कन यह सवाल पूछ रही है।कब जागेगा प्रदूषण विभाग? कब?क्या शहर की साँसें इतनी सस्ती हो गई हैं कि कुछ उद्योगपतियों की मेहरबानियों के आगे बेच दी जाएँ? यह लेख सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि  की हजारों परिवारों की चीख है एक ऐसी चीख जिसे प्रदूषण विभाग सुनना नहीं चाहता, लेकिन अब समय आ गया है कि शहर अपनी हवा के लिए लड़ाई लड़े, सवाल पूछे और जवाब ले।क्योंकि यह शहर जीना चाहता है
और उसे मरता हुआ देखने का गुनाह हम नहीं कर सकते।