मासूमों की दवा हुई लापता
बरेली जिला अस्पताल में डेढ़ माह से थैलेसीमिया की जरूरी दवाएं खत्म, इलाज के लिए जूझ रहे मासूम बच्चों की जिंदगी पर संकट।
➡️ जिला अस्पताल में डेढ़ माह से थैलेसीमिया की दवाएं खत्म
➡️ 121 मरीज, 70% मासूम बच्चे प्रभावित
➡️ मुफ्त मिलने वाली दवाएं अब बाजार से खरीदनी मजबूरी
➡️ रोजाना 100 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च
➡️ दवा न मिलने से बच्चों की सेहत पर सीधा असर
जन माध्यम। बरेली।
जिला अस्पताल की एक चूक ने थैलेसीमिया से जूझ रहे मासूम बच्चों और उनके परिवारों की जिंदगी को और भी मुश्किल बना दिया है। यह वह बीमारी है, जिसमें मरीजों को हर दस से पंद्रह दिन पर खून चढ़वाना पड़ता है और दिन में कई बार नियमित दवाएं लेनी होती हैं। लेकिन हैरानी और दुख की बात यह है कि जिला अस्पताल में डेढ़ माह से थैलेसीमिया की जरूरी दवाएं पूरी तरह खत्म हैं। जिन दवाओं के सहारे बच्चे हर दिन जिंदगी की जंग लड़ते हैं, वही दवाएं अब अस्पताल की अलमारियों से गायब हैं।
जिले में थैलेसीमिया के कुल 121 मरीज दर्ज हैं, जिनमें से करीब 70 प्रतिशत बच्चे हैं। इन बच्चों को हर महीने एक या उससे अधिक बार रक्त चढ़ाया जाता है। रक्त चढ़ाने के बाद शरीर में बढ़ने वाले आयरन को नियंत्रित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए उन्हें रोजाना दो से तीन बार दवा दी जाती है। अब तक ये दवाएं जिला अस्पताल से मुफ्त मिल जाती थीं, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को बड़ा सहारा मिलता था। लेकिन पिछले डेढ़ महीने से कैल्फर टैबलेट और डेसीरॉक्स जैसी जरूरी दवाएं अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं। मजबूरी में माता पिता को बाजार से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। एक गोली की कीमत करीब 30 रुपये है और रोजाना दो से तीन गोलियां देनी पड़ती हैं। इस तरह हर दिन लगभग 100 रुपये का खर्च, पहले से इलाज और खून चढ़ाने के बोझ से जूझ रहे परिवारों पर टूट पड़ा है। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के पिता अबरार अहमद बताते हैं कि दवा न मिलने से बच्चों की सेहत पर सीधा असर पड़ रहा है।
आर्थिक तंगी झेल रहे परिवारों के लिए यह स्थिति किसी सजा से कम नहीं है। कई माता पिता की आंखों में चिंता है अगर दवा नहीं मिली तो बच्चे कैसे बचेंगे? यह सवाल सिर्फ दवा का नहीं, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भी है। जब सरकारी अस्पताल ही मरीजों की बुनियादी जरूरतें पूरी न कर पाए, तो मासूम बच्चों और उनके अभिभावकों के पास उम्मीद कहां बचेगी? अब जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी तुरंत संज्ञान लें, ताकि इन बच्चों की जिंदगी फिर से भरोसे के सहारे आगे बढ़ सके।