दिव्यांग प्रमाणपत्रों के खेल में क्राइम ब्रांच की दस्तक
सीएमओ दफ्तर पर छापा, कंप्यूटर ऑपरेटर हिरासत में, कथित फर्जीवाड़े ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठाए सवाल
दिव्यांगों के हक पर कथित सौदेबाजी का आरोप, स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप,
सीएमओ दफ्तर पर क्राइम ब्रांच की दस्तक, खुलने लगीं परतें
फर्जी प्रमाणपत्रों के आरोप ने सरकारी सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया
कंप्यूटर ऑपरेटर हिरासत में, अब जांच की आंच किस तक पहुंचेगी?
जन माध्यम
बरेली। जिन हाथों में जरूरतमंद और दिव्यांग लोगों के अधिकारों की हिफाजत की जिम्मेदारी हो, अगर उन्हीं सरकारी गलियारों पर भ्रष्टाचार के साए का इल्जाम लग जाए तो सवाल सिर्फ एक कर्मचारी पर नहीं, पूरी निगरानी व्यवस्था पर उठता है। जिले के स्वास्थ्य विभाग में दिव्यांग प्रमाणपत्रों को लेकर उठे गंभीर सवाल अब दिल्ली क्राइम ब्रांच की कार्रवाई तक पहुंच गए हैं। शनिवार को टीम ने सीएमओ कार्यालय में छापा मारकर दिव्यांग प्रमाणपत्रों से जुड़े कंप्यूटर ऑपरेटर कुलदीप को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई।
बताया जा रहा है कि मामला कथित तौर पर रिश्वत लेकर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र तैयार किए जाने से जुड़ा है आरोप लगे हैं। लेकिन क्राइम ब्रांच की दस्तक ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया को कठघरे में ला खड़ा किया है।
कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग में बेचैनी का माहौल है। सूत्रों के मुताबिक टीम जिले में रहकर मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। जांच यदि आगे बढ़ती है तो प्रमाणपत्र तैयार करने से लेकर सत्यापन और अनुमोदन तक की पूरी कड़ी खंगाली जा सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में कई और चेहरे जांच के दायरे में आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सूत्रों के अनुसार जिले से भोजीपुरा भेजा गया एक कर्मचारी भी जांच के घेरे में बताया जा रहा है। इससे सवाल और गहरा गया है कि कथित फर्जीवाड़ा अगर हुआ है तो क्या यह सिर्फ एक कंप्यूटर ऑपरेटर की कारस्तानी थी या फिर व्यवस्था की किसी कमजोर कड़ी का फायदा उठाकर यह खेल आगे बढ़ता रहा?
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर है। दिव्यांग प्रमाणपत्र महज कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के अधिकार, सम्मान और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच का आधार होता है। किसी अपात्र व्यक्ति को कथित रूप से गलत प्रमाणपत्र मिलना और किसी वास्तविक दिव्यांग को उसके हक से महरूम होना दोनों ही स्थितियां व्यवस्था के लिए शर्मनाक हो सकती हैं।
मामले में सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह से पूछताछ किए जाने की संभावना भी जताई जा रही है, हालांकि इस संबंध में अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। जांच एजेंसी की कार्रवाई से यह सवाल भी उठ रहा है कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी कितनी प्रभावी थी।
अब असली इम्तिहान स्वास्थ्य विभाग का है। यदि आरोप बेबुनियाद हैं तो जांच उन्हें साफ करेगी, लेकिन यदि कथित फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है तो कार्रवाई महज एक कंप्यूटर ऑपरेटर तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जिम्मेदारी जहां तक जाती है, जांच की रोशनी भी वहीं तक पहुंचनी चाहिए।
दिव्यांगों के हक से जुड़ी व्यवस्था में कथित रिश्वत और फर्जीवाड़े की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। जरूरतमंदों के अधिकारों से खिलवाड़ करने वालों पर कठोर कार्रवाई ही उस भरोसे को बचा सकती है, जिसे सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य महकमा वर्षों में कायम करता है।