शौर्य और बलिदान को नमन, सूरजमल की स्मृति में उमड़ा जनसैलाब

परतापुर में महाराजा सूरजमल की पुण्यतिथि बलिदान दिवस के रूप में मनाई गई। कंचनपुर घोपला से गगोंल रोड तक विशाल वाहन रैली निकली और हजारों लोगों ने प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

शौर्य और बलिदान को नमन, सूरजमल की स्मृति में उमड़ा जनसैलाब
HIGHLIGHTS:

➡️ महाराजा सूरजमल की पुण्यतिथि पर बलिदान दिवस
➡️ कंचनपुर घोपला से गगोंल रोड तक विशाल वाहन रैली
➡️ हजारों लोगों ने प्रतिमा पर अर्पित किए पुष्प
➡️ शौर्य और पराक्रम की गाथाओं का हुआ वर्णन
➡️ शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ आयोजन
➡️ भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता

जन माध्यम।

हशमे आलम।  परतापुर (मेरठ)।
इतिहास के कुछ पन्ने केवल पढ़े नहीं जाते, वे पीढ़ियों को साहस और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते हैं। ऐसे ही पराक्रमी योद्धा भरतपुर के महान जाट शासक महाराजा सूरजमल की पुण्यतिथि को परतापुर क्षेत्र में बलिदान दिवस के रूप में श्रद्धा, गौरव और जनभागीदारी के साथ मनाया गया।

परतापुर थाना क्षेत्र के कंचनपुर घोपला स्थित महाराजा सूरजमल चौक से ट्रैक्टरों, कारों और अन्य वाहनों की सैकड़ों की संख्या में एक विशाल रैली निकाली गई। रैली रिठानी और दिल्ली रोड होते हुए गगोंल रोड पहुंची, जहां हजारों की संख्या में लोगों ने एकत्र होकर महाराजा सूरजमल की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर आयोजित सभा में वक्ताओं ने महाराजा सूरजमल के अद्भुत शौर्य और पराक्रम की गाथाएं साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस प्रकार महाराजा सूरजमल ने 18 बार मुगलों को युद्ध में पराजित किया और दिल्ली पर विजय प्राप्त कर इतिहास में अपना स्वर्णिम अध्याय दर्ज कराया। वक्ताओं ने कहा कि महाराजा सूरजमल केवल एक शासक नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस और राष्ट्ररक्षा के प्रतीक थे।

कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं के लिए पूरी, सब्जी और रायते का भंडारा आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की। आयोजन पूरी तरह शांतिपूर्ण और अनुशासित वातावरण में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर भूपेंद्र चौधरी, परतापुर व्यापार संघ अध्यक्ष सुमित चौधरी, रिठानी व्यापार संघ अध्यक्ष सुनील शर्मा, अमित धारीवाल, शोभिर चौधरी, जितेंद्र गुर्जर सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

महाराजा सूरजमल की पुण्यतिथि पर आयोजित यह कार्यक्रम एक बार फिर यह संदेश दे गया कि शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की विरासत आज भी समाज की चेतना में जीवित है—और आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती रहेगी।