बिजली बिल जमा कराने के नाम पर 81 हजार ठगी का आरोप
शाही में लाइनमैन पर बिजली बिल जमा कराने के नाम पर 81 हजार रुपये ठगने का आरोप, उपभोक्ता ने एसडीओ से की शिकायत।
➡️ बिजली बिल के नाम पर ठगी आरोप
➡️ लाइनमैन पर 81 हजार लेने का दावा
➡️ बिना रसीद भुगतान का आरोप
दीनानाथ कश्यप । जन माध्यम
शाही (बरेली)। बिजली विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कस्बे की एक महिला उपभोक्ता ने विभाग के एक लाइनमैन पर बिजली बिल जमा कराने के नाम पर 81 हजार रुपये वसूलने और रकम विभाग में जमा न करने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़िता ने इस संबंध में एसडीओ मीरगंज को लिखित शिकायत देकर जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, महिला के घरेलू कनेक्शन पर 1,02,504 रुपये का बकाया बिल दर्शाया गया था। आरोप है कि संबंधित लाइनमैन ने कनेक्शन काटते हुए मीटर भी उखाड़ लिया और बाद में “छूट” का हवाला देकर 81 हजार रुपये में मामला निपटाने की बात कही। पीड़िता का कहना है कि उसने भरोसा कर दो किश्तों—50 हजार और 31 हजार रुपये—में कुल 81 हजार रुपये नकद दे दिए।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि न तो कोई आधिकारिक रसीद दी गई और न ही भुगतान का कोई विभागीय प्रमाण। बाद में जब बिल की स्थिति जानी गई तो बकाया पूर्ववत दर्शाया गया, जिससे यह आशंका गहराती है कि रकम विभागीय खाते में जमा ही नहीं हुई। महिला का यह भी कहना है कि एफआईआर का डर दिखाकर उस पर दबाव बनाया गया।
यह मामला केवल एक उपभोक्ता की शिकायत भर नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आखिर क्यों उपभोक्ताओं को बिल जमा करने के लिए अधिकृत काउंटर या ऑनलाइन माध्यमों के बजाय कर्मचारियों को नकद भुगतान करना पड़ रहा है? क्या विभागीय निगरानी तंत्र इतना कमजोर है कि इस तरह की कथित वसूली बिना रसीद के संभव हो जाए?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस प्रकार की शिकायतें नई नहीं हैं। यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला है, बल्कि आम उपभोक्ताओं के भरोसे के साथ खिलवाड़ भी है। ऐसे मामलों में सख्त जांच और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है, ताकि विभाग की साख बहाल हो सके।
अवर अभियंता रामदेव वर्मा ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में आया है और यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब देखना यह है कि जांच महज औपचारिकता बनकर रह जाती है या वाकई जवाबदेही तय होती है। क्योंकि सवाल सिर्फ 81 हजार रुपये का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।