इमरजेंसी के नायक वीरेंद्र अटल
इमरजेंसी में पुलिस यातनाओं के बावजूद वीरेंद्र अटल बरेली के लोकतांत्रिक साहस और संघर्ष के प्रतीक बने।
➡️ इमरजेंसी में अत्याचार झेलकर भी नहीं झुके अटल
➡️ पुलिस की क्रूर यातनाओं ने भी नहीं तोड़ा मनोबल
➡️ लोकतंत्र रक्षा में बरेली के नायक बने
➡️ बीबीसी तक पहुंची साहस की कहानी
➡️ जनता ने सम्मान में दिया बरेली का अटल खिताब
इमरजेंसी में पुलिस की जुल्म और यातनाओं के बावजूद जनता के नायक बने
जन माध्यम
बरेली। वीरेंद्र अटल, जिन्हें आज पूरे शहर ने बरेली का अटल के नाम से सम्मानित किया, केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि साहस और लोकतंत्र की पहचान हैं। हाल ही में पं.घनश्याम दास सेंथल द्वारा 50 वर्षों से सुरक्षित रखी गई समाचार पत्र की छायाप्रति वीरेंद्र अटल को भेंट की गई, तो उनकी आँखें नम हो उठीं। यह केवल एक स्मृति पत्र नहीं, बल्कि उन अनगिनत संघर्षों की कहानी थी, जिसने बरेली की जनता के दिलों में उनका नाम अमर कर दिया।
युवा वीरेंद्र ने अपने जीवन की पहली ही चुनौतियों में साहस का परिचय दिया। जब यूपी के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा बरेली आए, तब इस तेजतर्रार नेता ने
नवल्टी चौराहे पर खुली हुई जीप से उन्हें उतारकर उनके मुंह पर काला रूमाल फेंक दिया। पुलिस ने उन्हें कोतवाली ले जाने की कोशिश की, लेकिन वीरेंद्र अटल ने जीआईसी मैदान पहुंचकर सभा में प्रवेश किया और मंच पर चढ़कर माइक छीन लिया। यह साहस केवल वीरता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का प्रतीक था। 24 जून 1975 की रात जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लागू की, तब वीरेंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन फैलाने की जिम्मेदारी निभा रहे थे। विपक्षी दलों के बड़े नेता गिरफ्तार थे, लेकिन वीरेंद्र अटल पुलिस की पकड़ से दूर थे। हालांकि, भाजपा के बरेली महानगर अध्यक्ष की मुखबिरी से 28 अक्टूबर को कोतवाल हाकिम राय ने उन्हें पकड़ लिया। कोतवाली में अत्याचार का ऐसा दौर चला कि उनके अंगूठों के नाखून तक खींचे गए, लेकिन वीरेंद्र अटल का साहस न टूटा। उन्होंने साथी रमेश आनंद को केवल भ्रमित करने के लिए गलत जानकारी दी, जबकि खुद किसी भी जानकारी को उजागर नहीं किया। जेल में उनके घायल हाथों पर पट्टियाँ बांधते समय कैदी भी उनके साहस को देखकर हड़ताल पर थे। उनकी कहानी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची और बीबीसी ने इसे ब्रॉडकास्ट किया।
वीरेंद्र अटल जनता के नायक बन चुके थे। जेल से रिहाई के बाद भी उन पर झूठे मामले लगाए गए और उन्हें मीसा में भगोड़ा घोषित किया गया। लेकिन 1977 में चौधरी चरण सिंह की सभा में उन्होंने पचास साठ हजार लोगों के सामने भाषण देकर साबित कर दिया कि हिम्मत और सत्य की शक्ति किसी बर्बरता के आगे नहीं झुकती। आज भी बरेली उनकी वीरता और अडिग साहस की मिसाल के रूप में याद करता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि लोकतंत्र और मानवता के लिए लड़ते हुए कोई भी कठिनाई, कोई भी यातना व्यक्ति को कमजोर नहीं कर सकती। वीरेंद्र अटल ने न केवल बरेली, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए हिम्मत और आदर्श का पैमाना स्थापित किया।