मधुमेह से जंग में रेगिस्तान का दूध बना हथियार

बरेली के वैज्ञानिक डॉ. सुहैल हकीम ख़ान के शोध में ऊँटनी के दूध से मधुमेह नियंत्रण की नई वैज्ञानिक उम्मीद सामने आई।

मधुमेह से जंग में रेगिस्तान का दूध बना हथियार
HIGHLIGHTS:

➡️ ऊँटनी के दूध में मौजूद प्रोटीन से मधुमेह नियंत्रण की उम्मीद
➡️ बरेली के वैज्ञानिक डॉ. सुहैल हकीम ख़ान का अंतरराष्ट्रीय शोध
➡️ शोध प्रतिष्ठित जर्नल Molecular Biology Reports में प्रकाशित
➡️ इंसुलिन स्तर और ब्लड शुगर पर सकारात्मक असर

जन माध्यम 
बरेली।
आज के दौर में मधुमेह केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की चिंता बन चुका है। महानगरों की चकाचौंध से लेकर गाँव-कस्बों की चौपालों तक, यह रोग हर उम्र के लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। असंतुलित खान-पान, बढ़ता मानसिक तनाव और गलत जीवनशैली ने मधुमेह को आम जन की समस्या बना दिया है। ऐसे समय में जब दवाइयों के दुष्प्रभाव लोगों को भयभीत करते हैं, प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्पों की तलाश एक नई उम्मीद बनकर सामने आती है। इसी उम्मीद की रोशनी में ऊँटनी के दूध पर आधारित एक नई वैज्ञानिक खोज ने आशा की नई किरण जगा दी है। पोषण से भरपूर माना जाने वाला ऊँटनी का दूध, जिसमें विशेष जैव सक्रिय प्रोटीन मौजूद हैं, मधुमेह नियंत्रण में सहायक हो सकता है।

बरेली के युवा वैज्ञानिक डॉ. सुहैल हकीम ख़ान ने इसी प्रोटीन पर शोध कर इसे वैज्ञानिक आधार दिया। उनका शोध अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नल मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है, जो न केवल उनकी मेहनत का प्रमाण है बल्कि बरेली जैसे शहर की बौद्धिक क्षमता को भी वैश्विक मंच पर स्थापित करता है। डॉ. सुहैल हकीम ख़ान ने अपनी एम.एससी. जामिया हमदर्द, नई दिल्ली से की और एनिमल बायोकेमिस्ट्री में पीएच.डी. राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल से पाँच वर्षों के कठोर परिश्रम के बाद पूरी की। शोध में ऊँटनी के दूध से प्रोटीन को वैज्ञानिक विधियों से अलग कर सेल लाइन और चूहों पर परीक्षण किया गया। परिणाम आशाजनक रहे इन प्रोटीनों ने बीटा कोशिकाओं के विकास और विभाजन को बढ़ावा दिया, इंसुलिन स्तर को बेहतर किया और ब्लड शुगर नियंत्रित रखी। इसके अलावा, खराब कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, जिगर और गुर्दे की कार्यक्षमता और ऑक्सीडेटिव तनाव में भी कमी आई। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऊँटनी के दूध पर आधारित फंक्शनल फूड्स मधुमेह प्रबंधन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

डॉ. सुहैल ने अपने शोध में परिवार के सहयोग को सबसे बड़ी ताकत बताया। यह खोज न केवल रोगियों की जीवन गुणवत्ता सुधार सकती है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर आर्थिक बोझ भी कम कर सकती है। डॉ. सुहैल अब पोस्टडॉक्टोरल शोध के अवसरों की दिशा में प्रयासरत हैं, यह दिखाते हुए कि विज्ञान, समर्पण और संवेदना मिलकर समाज के लिए नई राह बना सकते हैं।