सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं, निजी अस्पताल में बची जान
बरेली जिला अस्पताल में इमरजेंसी के दौरान इलाज नहीं मिला। सीएमओ कार्यालय के कर्मचारी की जान निजी अस्पताल में बची, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
➡️ सीएमओ कार्यालय में ड्यूटी के दौरान कर्मचारी बेहोश
➡️ इमरजेंसी वार्ड में न डॉक्टर मिला, न स्टाफ
➡️ ईसीजी मशीन भी मौके पर नहीं मिली चालू हालत में
➡️ एसीएमओ व डिप्टी सीएमओ निजी अस्पताल ले गए मरीज
हसीन दानिश । जनमाध्यम
बरेली। मंगलवार शाम करीब 4 बजे बरेली के जिला अस्पताल परिसर में स्थित मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) कार्यालय में अचानक हड़कंप मच गया। वहां तैनात डाटा ऑपरेटर संतोष काम करते-करते अचानक बेहोश होकर गिर पड़े। आसपास के कर्मचारियों ने उन्हें फौरन उठाया और लगा कि शायद हार्ट अटैक है। घबराहट में उन्हें तुरंत अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया, लेकिन वहां क्या मिला? कोई डॉक्टर नहीं, कोई स्टाफ नहीं, कोई इमरजेंसी सुविधा नहीं!मौके पर मौजूद एसीएमओ और डिप्टी सीएमओ ने खुद फोन पर डॉक्टर बुलाने की कोशिश की, ईसीजी कराने को कहा, लेकिन मौके पर ईसीजी मशीन भी काम नहीं कर रही थी या उपलब्ध ही नहीं थी। आखिरकार, सरकारी अस्पताल में इलाज की उम्मीद छोड़कर दोनों अधिकारी संतोष को निजी अस्पताल लेकर भागे। वहां जाकर उनकी हालत संभली,यह घटना सिर्फ संतोष की नहीं, बल्कि बरेली के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की पूरी नाकामी की है। जहां आम आदमी को तो छोड़िए, सीएमओ ऑफिस का अपना कर्मचारी भी मौत के कगार पर पहुंच जाए और सरकारी अस्पताल उसे ठुकरा दे यह कितनी बड़ी शर्मिंदगी है?
जब इस पूरे मामले पर जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. अजय मोहन अग्रवाल से बात की गई, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने सीधे-सीधे डॉक्टर न होने का बहाना बनाया और कहा, "मुझे इस घटना की जानकारी नहीं है। अगर ऐसा हुआ भी तो शायद मरीज ने यहां भर्ती होने से मना कर दिया होगा।"
सवाल यह है क्या हार्ट अटैक के शिकार व्यक्ति को पहले भर्ती होने का इंतजार करना पड़ता है? क्या इमरजेंसी में ईसीजी कराने के लिए मरीज को "हां" कहना जरूरी है? क्या सरकारी अस्पताल की 24 घंटे उपलब्ध सुविधा सिर्फ कागजों पर है, या सिर्फ "भर्ती मरीजों" के लिए?
डॉ. अग्रवाल ने यह भी माना कि जिला अस्पताल हृदय रोग विशेषज्ञ, मूत्र रोग विशेषज्ञ समेत कई जरूरी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। वे हर महीने सरकार को पत्र लिखते हैं, लेकिन तैनाती का कोई नामोनिशान नहीं। तो सवाल उठता हैकब तक आम जनता और सरकारी कर्मचारी इस लापरवाही का शिकार होते रहेंगे? क्या सरकार को तब तक इंतजार करना पड़ेगा जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए?
यह घटना बरेली स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल रही है। जहां निजी अस्पताल में फौरन इलाज मिल जाता है, वहीं सरकारी अस्पताल में अपने ही स्टाफ को दरवाजे से लौटना पड़ता है। यह न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता है, और पूरी तरह से सरकार की नाकामी के साथ जनता के विश्वास पर सीधा हमला है।
संतोष की जान बच गई, लेकिन कितने संतोष अभी भी इंतजार कर रहे हैं? कब सुधरेगा यह हाल?