मुनाफे की आग में जलती हमारी सेहत

बरेली में खाद्य मिलावट के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। चालू वित्त वर्ष में लिए गए 1,355 नमूनों में से 54 प्रतिशत फेल पाए गए। दूध, पनीर, घी, मसाले और मिठाइयों में मिलावट से सेहत पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

मुनाफे की आग में जलती हमारी सेहत
AI द्वारा काल्पनिक फोटो
HIGHLIGHTS:

1,355 में से 54% नमूने फेल

दूध, पनीर, घी में खतरनाक मिलावट

738 मुकदमे, करोड़ों का जुर्माना

त्योहारों पर विशेष अभियान में खुलासा

हसीन दानिश । जन माध्यम
बरेली।
सड़कों पर त्योहारों का रंग चढ़ता है, मिठाइयों की महक फैलती है, लेकिन इस महक के पीछे छिपा है एक काला सच। दूध में यूरिया मिलाने वाला, मावे में साबुन और सिंथेटिक पाउडर घोलने वाला, पनीर में स्टार्च, घी में वनस्पति तेल, हल्दी में रंग और मिर्च में ईंट का चूरा डालने वाला कोई एलियन नहीं,वही हमारा पड़ोसी,वही दुकानदार, वही सप्लायर है। और सबसे दर्दनाक बात? हम ही उसके ग्राहक हैं।ज़िले में हाल के महीनों में खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच ने जो आंकड़े सामने लाए हैं, वे दिल दहला देने वाले हैं। फरवरी 2026 में ही रिपोर्ट आई कि जिले में लिए गए नमूनों में से बड़ी संख्या फेल पाई गई—तेल, घी, मसाले, दूध, पनीर और मिठाइयों तक में मिलावट। पिछले दस महीनों (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 तक) में 738 मुकदमे दर्ज हुए, और 404 कारोबारियों पर 1 करोड़ 43 लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगा। जनवरी 2026 में अकेले 61 कारोबारियों पर 30 लाख से ज्यादा का जुर्माना लगा।होली से ठीक पहले विशेष अभियान चला, जिसमें शिफा डेरी परसौना रोड से मिश्रित दूध, राजेश मिल्क क्रीम नारियावल से पनीर, और गुलाबनगर के एक प्रतिष्ठान से दूध के नमूने लिए गए और ये सब जांच में संदिग्ध पाए गए। मिर्च पाउडर में प्रतिबंधित रंग, घी में मिलावट, धनिया-हल्दी में गड़बड़ी नामी ब्रांड्स भी नहीं बचे। मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी अक्षय गोयल की टीम ने कोल्ड स्टोरेज तक छापे मारे, नोटिस जारी किए, नमूने लैब भेजे।चालू वित्त वर्ष में बरेली में 1,355 नमूनों में से 54% (730) फेल रहे, 605 अधोमानक, 86 असुरक्षित, 39 मिथ्या छाप। दूध के 127, पनीर के 44, मावा के 23, घी के 9 नमूनों की जांच में विजातीय वसा, डिटर्जेंट, यूरिया, सिंथेटिक केमिकल की मौजूदगी पाई गई। डॉक्टरों का कहना है कि इससे किडनी, लिवर, हृदय, पाचन तंत्र और त्वचा पर गंभीर असर पड़ता है। बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं सब खतरे में।
लेकिन सवाल सिर्फ मिलावटखोरों का नहीं। त्योहार आते हैं तो मांग बढ़ती है,सस्ती मिठाई, चमकदार घी, जल्दी तैयार पनीर। हम सस्ता चाहते हैं, चमकदार चाहते हैं, तो सप्लायर मिलावट क्यों न करे? हम वही दुकान से सामान ले आते हैं जहां दो दिन पहले छापा पड़ा था, क्योंकि "सस्ता मिल रहा था"। सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हैं कि"देखो, पकड़ा गया!"फिर चुपचाप उसी से खरीदारी।हम किसान को कोसते हैं, दुकानदार को, सरकार को। लेकिन आईने में देखा? वोट देते वक्त जाति-धर्म की बात करते हैं, खाद्य लैब, इंस्पेक्टर, जांच की मांग नहीं करते। सरकार हमारा आईना है।जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, मिलावट नहीं रुकेगी।बरेली में हर त्योहार पर ये खेल दोहराया जाता है। बच्चे जिन मिठाइयों से खुश होते हैं, वो केमिकल से बनी होती हैं। जो दूध हम बच्चों को पिलाते हैं, उसमें झाग डिटर्जेंट का है। हम खुद अपने घर में जहर परोस रहे हैं, और फिर कहते हैं,"सिस्टम खराब है।"अब वक्त है जागने का। खुद से पूछिए कि अगर पता चले कि आज का पनीर नकली है, तो क्या खरीदेंगे? अगर मोहल्ले की दुकान पर मिलावट पकड़ी जाए, तो क्या दोबारा जाएंगे? शिकायत करेंगे या सिर्फ पोस्ट डालकर लाइक गिनेंगे?
मिलावट सिर्फ खाने में नहीं,हमारे चरित्र में, जिम्मेदारी में, नागरिकता में है। जब तक ये मिलावट खत्म नहीं होगी, "शुद्ध भारत" सिर्फ नारा रहेगा।सवाल सरकार से पहले खुद से पूछिए। क्योंकि जहर बेचने वाला भी हम हैं, और खाने वाला भी हम ही।बरेली की ये कहानी सिर्फ बरेली की नहीं,पूरे देश की है। अब रोना-धोना बंद करो। बदलाव खुद से शुरू करो।