शून्य मृत्यु जिला की ओर बरेली का कदम
बरेली में एडीजी रमित शर्मा के नेतृत्व में ‘शून्य मृत्यु जिला’ अभियान शुरू। सड़क सुरक्षा को जन-आंदोलन बनाने का संकल्प। पुलिस और जनता मिलकर बनाएंगे सुरक्षित सड़कें।
➡️ बरेली में ‘शून्य मृत्यु जिला’ अभियान का शुभारंभ, सड़क सुरक्षा पर जोर
➡️ एडीजी रमित शर्मा: “नियम जीवन के लिए, डर के लिए नहीं”
➡️ डीआईजी अजय साहनी: “हर दुर्घटना किसी घर का उजड़ना है”
➡️ एसएसपी अनुराग आर्य: “सख्ती के साथ संवेदनशीलता हमारा लक्ष्य”
➡️ पुलिस आरक्षियों को सतर्कता के लिए पुरस्कार, हर थाने में जागरूकता शिविर
एडीजी रमित शर्मा,की मुहिम से सड़क सुरक्षा बनी अभियान
जन माध्यम
बरेली। रविवार का दिन रिज़र्व पुलिस लाइन के रविन्द्रालय सभागार में ऐसा दृश्य देखने को मिला, जहाँ वर्दी के पीछे का दिल साफ़ दिखाई दिया। मंच पर बैठे थे तीन चेहरे एडीजी रमित शर्मा, डीआईजी अजय कुमार साहनी और एसएसपी अनुराग आर्य। परंतु आज वे केवल पुलिस अधिकारी नहीं थे, बल्कि जीवन के रक्षक, समाज के मार्गदर्शक और संवेदनशील प्रहरी के रूप में सामने आए। आज का अवसर था शून्य मृत्यु जिला अभियान के शुभारंभ का एक ऐसा संकल्प, जिसमें बरेली ने ठान लिया है कि उसकी सड़कों पर अब कोई जान बेवजह नहीं जाएगी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एडीजी रमित शर्मा ने बताया कि, सड़क सुरक्षा कोई सरकारी विषय नहीं, यह मानवीय संवेदना का प्रश्न है। जब कोई सड़क पर गिरता है, तो घायल केवल शरीर नहीं होता, पूरा परिवार टूटता है।उन्होंने कहा कि ‘शून्य मृत्यु जिला’ का लक्ष्य कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। यदि जनता और पुलिस एक साथ खड़ी हो जाएँ, तो सड़कें केवल रास्ते नहीं, बल्कि जीवन की डोर बन सकती हैं।
उन्होंने अपने शब्दों से एक संदेश दिया हम नियम इसलिए नहीं मानते कि हमें डर है, बल्कि इसलिए मानते हैं कि हमें अपने जीवन से प्रेम है।
यह वाक्य सभागार में उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय में उतर गया।
रमित शर्मा ने कहा कि पुलिस अब केवल चालान काटने की संस्था नहीं रहेगी, बल्कि वह हर नागरिक को यह समझाने का प्रयास करेगी कि हेलमेट और सीट बेल्ट जीवन की सुरक्षा कवच हैं, बोझ नहीं।
उन्होंने जवानों से कहा सड़क पर उतरना केवल ड्यूटी नहीं, दायित्व है। हर मुस्कराता चेहरा तुम्हारे कर्तव्य की जीत है।डीआईजी अजय कुमार साहनी हर दुर्घटना किसी घर का उजड़ना है अपने वक्तव्य में डीआईजी अजय कुमार साहनी ने एक ऐसी बात कही जिसने पूरे वातावरण को भावुक कर दिया। उन्होंने कहा जब सड़क पर कोई दुर्घटना होती है, तो आँकड़ा नहीं बढ़ता, किसी माँ की आँखों का उजाला बुझता है।उन्होंने कहा कि अब पुलिस केवल व्यवस्था बनाने की संस्था नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी का आईना बनेगी।
साहनी ने कहा हम हर गाँव, हर स्कूल, हर मोहल्ले में यह संदेश पहुँचाएँगे कि नियम डर के लिए नहीं, जीवन के लिए बनाए गए हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आने वाले दिनों में सड़क सुरक्षा के हर पहलू को जन-सहभागिता से जोड़ा जाएगा। ड्राइवरों, युवाओं, विद्यार्थियों और महिलाओं तक यह अभियान पहुँचेगा।साहनी का विश्वास था जब जनता और पुलिस एकसाथ चलेंगी, तो बरेली की सड़कें जीवन की राह बनेंगी, मौत की नहीं। वहीं जिले के मुखिया एसएसपी अनुराग आर्य संवेदनशीलता ही सच्ची सख़्ती है।कार्यक्रम में जब एसएसपी अनुराग आर्य ने बोलना शुरू किया, तो सभागार में गहरी शांति थी। उनके शब्दों में अनुभव और अपनापन दोनों थे। उन्होंने कहा
हम सड़क पर गश्त करते हैं, चालान भी करते हैं, पर हर दुर्घटना हमें भीतर से झकझोरती है। अब समय है कि हम सख़्ती के साथ संवेदनशीलता भी दिखाएँ।उन्होंने बताया कि पुलिस ने पिछले महीनों में हेलमेट और सीट बेल्ट के लिए जागरूकता अभियान चलाए हैं, जिससे दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।एसएसपी ने कहा हम सड़कों को भय का नहीं, सुरक्षा का प्रतीक बनाना चाहते हैं। हर नागरिक के जीवन की रक्षा हमारा परम धर्म है।
इस अवसर पर रिक्रूट आरक्षी कविता रानी और रिक्रूट आरक्षी खुशबू पाल को अपने कर्तव्यों के दौरान सतर्कता और उत्कृष्ट आचरण के लिए एडीजी रमित शर्मा द्वारा एक हजार- एक हजार के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।यह सम्मान प्रतीक था उस नई सोच का, जिसमें कर्तव्य को सम्मान मिलता है, और सेवा को सराहना।शून्य मृत्यु जिला केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक आंदोलन है एक ऐसी राह, जहाँ पुलिस और जनता एक साथ खड़ी हैं।
कार्यक्रम में निर्णय लिया गया कि बरेली के हर थाना क्षेत्र में सड़क सुरक्षा जागरूकता शिविर, विद्यालयी गोष्ठियाँ और यातायात मित्र कार्यक्रम चलाए जाएँगे। एडीजी रमित शर्मा का विजन पुलिस से जनता तक भरोसे की डोर। रमित शर्मा के नेतृत्व में पुलिस का चेहरा बदला है। अब यहाँ वर्दी में आदेश नहीं, अपनापन झलकता है।
डीआईजी अजय कुमार साहनी ने इस विजन को दिशा दी है, और एसएसपी अनुराग आर्य ने इसे ज़मीन पर उतारा है। तीनों अधिकारियों की यह त्रिमूर्ति इस बात का प्रतीक बन चुकी है कि पुलिस व्यवस्था में भी मानवीय संवेदना की गूंज हो सकती है।