फर्ज़ की जीत: IPS कल्पना सक्सेना पर हमले के दोषियों को 10 साल की कैद, जाने मामला

ADCP कल्पना सक्सेना को गाड़ी से कुचलकर जान से मारने की कोशिश मामले में आज अदालत का फैसला आ गया है। इस बीच सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट के अंदर आरोपी बिलख बिलख कर जज के सामने रोने लगे। वही आरोपियों के परिजन कोर्ट परिसर के बाहर रोते रहे।

फर्ज़ की जीत: IPS कल्पना सक्सेना पर हमले के दोषियों को 10 साल की कैद, जाने मामला

बरेली, नापतोल न्यूज़। गाजियाबाद में तैनात अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (एडीसीपी) कल्पना सक्सेना पर हुए हमले के मामले में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कानून की इस बड़ी जीत ने दिखा दिया कि जुर्म कितना भी संगठित क्यों न हो, इंसाफ की तलवार से बच नहीं सकता। तीन भ्रष्ट पुलिसकर्मी और उनके एक साथी को 10-10 साल की कठोर सजा सुनाई गई है साथ ही 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

कोर्ट में छलका पछतावा, बाहर रोते रहे परिजन

जब अदालत ने सजा का ऐलान किया। तो दोषी पुलिसकर्मी जज के सामने फूट-फूट कर रो पड़े। वहीं उनके परिवार के सदस्यों की चीखें अदालत परिसर में गूंज उठीं। लेकिन न्याय की इस घड़ी में कल्पना सक्सेना के साहस और सत्य की विजय का भाव पूरे सिस्टम में मिसाल बन गया।

2010 की उस मनहूस रात का सच

2 सितंबर 2010 की रात बरेली की सड़कों पर कानून के रखवाले ही कानून तोड़ रहे थे। ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की एक टोली ट्रक चालकों से अवैध वसूली कर रही थी। जैसे ही तब की एसपी ट्रैफिक कल्पना सक्सेना को इसकी भनक लगी तो वह मौके पर पहुंचीं। उनकी ईमानदारी और जज़्बे ने अपराधियों के हौसले पस्त कर दिए, लेकिन भ्रष्टाचार के नशे में डूबे पुलिसकर्मियों ने भागने की कोशिश की। कल्पना सक्सेना ने जब उनका पीछा किया तो उन्होंने अपने ही वरिष्ठ अधिकारी को कुचलने की कोशिश की। 200 मीटर तक घसीटे जाने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहीं। लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा और आज वही सच्चाई अदालत में जीत गई।

पुलिस की वर्दी में छिपे गुनहगारों की कहानी खत्म

सिपाही रविंद्र, रावेंद्र, मनोज और उनके साथी धर्मेंद्र के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया गया। पहले सस्पेंड, फिर विभागीय जांच में दोषी पाए जाने पर इनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। लेकिन कानून यहीं नहीं रुका अदालत ने भी उन्हें वह सजा दी जिसके वे हकदार थे।

भ्रष्टाचार पर नहीं लगा ठप्पा, पर सजा हुई तय

मामले में 14 गवाहों और 22 ठोस सबूतों को पेश किया गया। जिससे अदालत को यकीन हुआ कि जानलेवा हमले के दोषी यही लोग हैं। लेकिन कोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमाणित नहीं माना। फिर भी इस फैसले ने साफ कर दिया कि कर्तव्य की राह में खड़े होने वालों को न्याय जरूर मिलेगा।

कल्पना सक्सेना – एक मिसाल, एक प्रेरणा 

1990 बैच की पीपीएस अधिकारी कल्पना सक्सेना। जिन्हें 2010 में आईपीएस कैडर मिला। आज ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता की मिसाल बन चुकी हैं। इस फैसले ने यह जता दिया कि अपराध कितना भी संगठित क्यों न हो, हिम्मत और सच्चाई की ताकत के आगे टिक नहीं सकता। यह इंसाफ सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे कानून-व्यवस्था तंत्र की जीत है।